धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—202

रावण के बारे में हर कोई जानता है। वह राक्षस वंश का था और उसके द्वारा की गई गलतियों के कारण हर साल दशहरे के दिन रावण दहन भी किया जाता है। वैसे क्या आपको मालूम है कि महान विद्वान और पंडित होने के साथ-साथ रावण भगवान शिव का परम भक्त भी था।

एक बार की बात है, रावण ने सोचा कि क्याें न अपने आराध्य शिव जी को प्रसन्न किया जाए। यह विचार कर वह तपस्या में लीन हो गया। बहुत समय तक तपस्या करने के बाद भी शिव जी प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने अपना सिर काट कर शिव जी को अर्पण कर दिया। इसके बाद उसका सिर फिर से जुड़ गया। इसके बाद उसने फिर से अपना सिर काट दिया, लेकिन उसका सिर फिर से जुड़ गया। इस तरह एक-एक करके उसने दस बार अपना सिर काटा और हर बार उसका सिर जुड़ जाता।

रावण की इस तपस्या को देख कर शिव जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान के साथ ही उसे दस सिर भी दे दिए। इस तरह रावण का नाम पड़ा दशानंद पड़ा।

रावण के दस सिर होने को लेकर इस कहानी के साथ-साथ कई अन्य कहानियां भी प्रचलित हैं। ऐसा कहा जाता है कि रावण दस सिर नहीं थे, वह सिर्फ दस सिर होने का भ्रम पैदा करता था। वहीं, कुछ का यह भी मानना है कि रावण छह दर्शन और चार वेदों को जानने वाला था, इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था। शायद इस कारण से भी उसे दशानंद भी कहा जाता था।

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