धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—503

एक समय की बात है एक गुरु जी के तीन शिष्य थे। गुरु जी ने अपने तीनों शिष्यों को एक पोटली में कुछ दाल के दाने बांधकर दिए और कहा इन तीनों दानों को अपने अनुसार उपयोग करे। और मुझसे एक साल बाद आकर मिले। तीनों शिष्यों ने अपनी अपनी पोटली ली और चल दिए।

पहले शिष्य ने पोटली खोली की उसने देखा इसमें तो मात्र चने के दाने है, उसने वो दाने लिए और पूजा में रख लिया की ये गुरु जी हमें प्रसाद दिया है और रोज़ उसकी पूजा करता। दूसरे शिष्य ने देखा इसमें चने के दाने हैं तो उसने उसकी दाल बनायीं और उसने दाल खुद खायी और और उसने अपने परिवार को खिला ली।

उधर तीसरे शिष्य ने देखा और सोचा की गुरु जी ने ये दाल के दाने दिए है तो इसमें कुछ रहस्य होगा उसने वो दाने जमीन में गाड़ दिए जिससे 1 साल में बहुत खेत हो गया की और उसमे खूब दाल लगी जिससे जो भी आता तो उसे खूब दाल रोटी खिलाते।

एक साल बाद तीनों शिष्य गुरु जी के पास आये। और तीनों ने एक—एक कर गुरु जी को बताया कि क्या—क्या उन्होंने किया उस पोटली के साथ। गुरु जी ने बताया कि मैंने तुम तीनों को एक जैसा ज्ञान दिया है। लेकिन सब ने अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्ञान को उठाया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, यही सब हमारे साथ भी होता है। एक क्लास में टीचर सब बच्चों को एक साथ पढ़ाते हैं। सभी एक जैसा पढ़ते हैं। लेकिन कोई बच्चा टॉप करता है कोई फेल हो जाता है। हम अपनी बुद्धि को कितना स्थिर करते हैं, कैसे अपने दिमाग को उपयोग करते हैं यही हमारे जीवन की दिशा को निश्चित करता है। इसलिए हमेशा सीखने की जिज्ञासा रखे, सीखते चले और जीवन को अच्छा बनाये।

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Jeewan Aadhar Editor Desk

सत्यार्थप्रकाश के अंश—36