धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से — 592

एक राजा था जिसके तीन पुत्र थे। एक दिन, राजा ने अपने बेटों को बुलाया और कहा कि वे अपने-अपने तरीके से धर्म का पालन करें और जो सबसे अच्छा धर्म का पालन करेगा, उसे वह अपना उत्तराधिकारी बनाएगा।

पहले पुत्र ने एक ब्राह्मण को अपने घर लाया और उसकी खूब सेवा की। दूसरे पुत्र ने एक साधु को अपने घर लाया और उसकी खूब सेवा की। तीसरे पुत्र ने एक घायल कुत्ते को देखा, जिसके शरीर में कई घाव थे। वह उसे अपने घर लाया, उसके घावों को धोया, मरहम लगाया और उसकी सेवा की।

जब राजा ने तीनों बेटों के कार्यों को देखा, तो उसने छोटे पुत्र को राजगद्दी सौंपी। राजा ने कहा कि सच्ची सेवा मूक प्राणियों की निस्वार्थ सेवा में निहित है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, सच्ची सेवा किसी भी प्राणी की निस्वार्थ भाव से मदद करने में निहित है, चाहे वह मनुष्य हो या पशु। हमें किसी भी प्रकार की भेदभाव या स्वार्थ के बिना दूसरों की मदद करनी चाहिए।

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