धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 659

एक बार की बात है। एक गाँव में एक युवा लड़का रहता था। उसकी एक बुरी आदत थी—हर छोटी बात पर गुस्सा करना। लोग उससे डरने लगे थे। उसके मित्र भी उससे दूर-दूर रहने लगे।

वह युवक अपनी इस आदत से परेशान था। एक दिन वह गाँव के संत के पास पहुँचा और बोला—
युवक: “गुरुदेव, मेरी आदत बहुत खराब है। गुस्से में मैं ऐसे शब्द बोल देता हूँ, जिनसे सब दुखी हो जाते हैं। मैं चाहता हूँ कि यह आदत बदल जाए, पर समझ नहीं आता कैसे।”

संत मुस्कराए और उसे अपने आश्रम के पास लगे एक बड़े नीम के पेड़ की ओर ले गए।
संत ने कहा— “बेटा, ज़रा जाकर उस छोटे-से पौधे को उखाड़कर लाओ।” युवक ने पास ही लगे छोटे पौधे को झट से खींचा और बाहर निकाल दिया।

फिर संत बोले—”अब इस मध्यम आकार की झाड़ी को उखाड़ो।” युवक ने थोड़ा ज़ोर लगाया, पसीना बहा, तब कहीं जाकर झाड़ी निकल पाई।

अब संत ने कहा—”अब जाकर इस नीम के पेड़ को उखाड़ो।” युवक ने पूरी ताकत लगाई, मिट्टी खोदी, पसीना-पसीना हो गया, पर पेड़ ज़रा भी नहीं हिला।

थककर वह बोला—”गुरुदेव, यह तो असंभव है। इसे मैं नहीं उखाड़ सकता।”

संत ने समझाया— “बेटा, आदत भी इसी तरह होती है। जब आदत नई-नई होती है, तब उसे बदलना आसान होता है। लेकिन समय के साथ वह गहरी जड़ पकड़ लेती है, और फिर उससे छुटकारा पाना कठिन हो जाता है।”

युवक ने सिर झुकाकर कहा—”गुरुदेव, मैं समझ गया। अब से मैं छोटी-छोटी गलत आदतों को समय रहते बदलने का प्रयास करूँगा, ताकि वे पेड़ की तरह मजबूत न हो जाएँ।”

उस दिन से उसने ध्यान रखना शुरू किया। जब भी गुस्सा आता, वह गहरी साँस लेता और चुप रहता। धीरे-धीरे उसकी आदत बदल गई और वह गाँव का सबसे प्रिय युवक बन गया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, आदतें समय रहते सुधार लेनी चाहिए। जितनी जल्दी हम उन्हें सँभाल लेंगे, उतनी आसानी से जीवन सुंदर बन जाएगा।

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