धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—674

किशन नाम का एक युवक था। वह पढ़ाई में होशियार था, लेकिन जैसे ही कोई कठिन विषय सामने आता, वह जल्दी हार मान लेता। बार-बार असफल होने के डर से वह प्रतियोगी परीक्षा छोड़ने तक की सोचने लगा।

एक दिन उसके गुरु ने उसे बुलाकर कहा— “बेटा, क्या तुम जानते हो, हनुमान जी हमें कठिनाइयों में हार न मानने का सबसे बड़ा संदेश देते हैं?”

किशन ने जिज्ञासा से पूछा—“गुरुजी, कैसे?”

गुरु ने कहा— “जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए, तो हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने भेजा गया। रास्ता बहुत कठिन था—पहाड़, जंगल, राक्षसों की बाधाएँ, यहाँ तक कि समय भी बहुत कम था। हनुमान जी के सामने दो ही विकल्प थे—या तो हार मान लें और खाली हाथ लौट जाएँ, या फिर किसी भी तरह उपाय ढूँढकर अपने कार्य को पूरा करें।

हनुमान जी ने हार नहीं मानी। जब वे संजीवनी बूटी पहचान न पाए, तब पूरे पर्वत को ही उठा लाए। यदि वे बीच में रुक जाते, तो लक्ष्मण का जीवन नहीं बचता और रामायण की दिशा ही बदल जाती।”

गुरु ने आगे कहा—“देखो बेटा, हनुमान जी की तरह ही हमें भी कठिनाइयों में रुकना नहीं चाहिए। यदि एक रास्ता बंद हो, तो दूसरा रास्ता खोजो। परिश्रम और विश्वास से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।”

यह सुनकर किशन की आँखें चमक उठीं। उसने परीक्षा छोड़ने का विचार त्याग दिया और पूरी मेहनत से पढ़ाई करने लगा। कुछ ही महीनों बाद उसने परीक्षा में सफलता प्राप्त की।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि कठिनाइयों में हार मान लेना कमजोरी है, परंतु डटे रहना ही सच्ची विजय की कुंजी है।

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