गढ़ मथुरा के पास एक छोटे से आश्रम में वासुदेव नाम के संत रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग समस्याएँ लेकर आते थे, और संत हर किसी को बड़ा ही सरल मार्ग दिखाकर लौटाते थे।
एक दिन… एक युवक आया— नाम था अर्जुन। मन में भटकाव, डर और आलस भरा हुआ। उसने कहा— “गुरुदेव, मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, पर हर बार सही समय का इंतज़ार करता हूं। लगता है अभी समय ठीक नहीं, इसलिए मैं कदम नहीं बढ़ाता।”
संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ बाहर ले गए। आश्रम के पास एक सूखी सी जमीन थी। संत ने अर्जुन से कहा— “यहाँ बीज बो दो।”
अर्जुन बोला,“गुरुदेव, बादल नहीं हैं… बारिश नहीं हुई… अभी बोऊंगा तो क्या फायदा?
थोड़ा इंतज़ार कर लेता हूं।”
संत ने कुछ नहीं कहा।
अगले दिन… फिर संत ने कहा— “अब बो दो।”
अर्जुन ने कहा— “आज तो धूप बहुत है, बीज जल जाएंगे। अभी सही समय नहीं है।”
संत ने फिर कुछ नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद… फिर संत बोले— “अर्जुन, अब बो दो।”
अर्जुन ने कहा— “आज तो तेज हवा है, मिट्टी उड़ रही है… मेरा बोया हुआ बह जाएगा। कल कर लूंगा।”
संत चुप रहे।
एक सप्ताह बाद… अचानक ज़ोरदार बारिश हुई।
अर्जुन दौड़कर आया, बोला— “गुरुदेव! अब तो मौसम ठीक है, अब बीज बो देता हूं!”
लेकिन संत उसे उसी जगह ले गए। जमीन पर पानी भरा था, मिट्टी गीली और फिसलन भरी थी। खेती के लायक बिल्कुल नहीं।
अर्जुन ने निराश होकर कहा— “अब तो ये जमीन महीनों काम की नहीं रहेगी…”
संत बोले— यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता था, बेटा… जीवन में समय कभी पूरी तरह अनुकूल नहीं होता। अनुकूल समय बनता है, इंतज़ार करने से नहीं, कदम बढ़ाने से।”
फिर उन्होंने हाथ पकड़कर कहा— “जो बीज समय पर बोया जाता है, वही फल बनकर सामने आता है। जो हर बार बहाने ढूंढता है, वह मौसम नहीं, मौका खोता है। अगर तुम हर काम के लिए ‘सही समय’ ढूंढोगे, तो याद रखना— समय निकल जाएगा, और हाथ में पछतावा रह जाएगा।”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
वह बोला— “गुरुदेव, मैं समझ गया…अब मैं इंतज़ार नहीं करूंगा, जो करना है अभी से शुरू करूंगा।”
संत मुस्कुराए— “शाबाश! जब मन में तत्परता होती है, तभी अवसर भी मिलने लगते हैं। अब मौका नहीं चूकना—क्योंकि मौका बार-बार नहीं आता।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “सही समय” कभी नहीं आता, “हम कदम उठाते हैं”— तब समय सही हो जाता है। इंतज़ार करने वाले पीछे रह जाते हैं, और कदम बढ़ाने वाले आगे निकल जाते हैं।








