स्वामी श्रद्धानंद जी के जीवन का यह वृत्तांत उस समय का है जब वे लोक-कल्याण के लिए भ्रमण पर थे। उनके साथ उनके कुछ अनन्य शिष्य भी थे, जो योग और ध्यान को ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग मानते थे।
यात्रा के दौरान, वे एक ऐसे क्षेत्र में पहुँचे जहाँ प्रकृति का प्रकोप चरम पर था। लगातार तीन वर्षों से वर्षा न होने के कारण धरती फट चुकी थी और कुएं सूख गए थे। वहां के ग्रामीण न केवल भूख से, बल्कि हैजा जैसी भयंकर बीमारी से मर रहे थे। सड़कों के किनारे कंकाल जैसे शरीर पड़े थे, जिन्हें उठाने वाला भी कोई न था।
स्वामी जी के मुख्य शिष्य ने कहा, “महाराज, यह स्थान अत्यंत अपवित्र और रोगग्रस्त है। यहाँ रुकना हमारे जीवन और हमारी साधना के लिए घातक हो सकता है। हमें शीघ्र ही ऋषिकेश की ओर बढ़ना चाहिए, जहाँ गंगा तट पर शांति और भक्ति का वातावरण है।”
स्वामी श्रद्धानंद जी की आँखों में करुणा के आँसू भर आए। उन्होंने अत्यंत शांत स्वर में कहा:
“गंगा तट पर तो परमात्मा की शांति है ही, लेकिन इस समय परमात्मा इन बिलखते हुए बच्चों और दम तोड़ते वृद्धों की आंखों में रो रहा है। अगर मैं आज इन्हें छोड़कर गंगा स्नान के लिए गया, तो गंगा का जल मेरे पाप नहीं धो पाएगा।”
स्वामी जी ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि जो धन उन्होंने मंदिरों के निर्माण और आश्रम के लिए एकत्रित किया था, उसे तुरंत भोजन और दवाइयों पर व्यय किया जाए। स्वामी जी ने एक फूस की झोपड़ी में अपना निवास बनाया और उसे ही चिकित्सालय का रूप दे दिया। वे स्वयं अपने हाथों से रोगियों के मवाद साफ करते, उन्हें नहलाते और अपने हिस्से का भोजन भी उन्हें दे देते।
पहले तो शिष्य हिचकिचाए, लेकिन जब उन्होंने अपने गुरु को एक अछूत समझे जाने वाले रोगी के सिर को अपनी गोद में रखकर सहलाते देखा, तो उनका अहंकार और ‘पवित्रता’ का भ्रम टूट गया।
महीनों की सेवा के बाद, जब उस गाँव में पहली बारिश हुई और लोग स्वस्थ होने लगे, तब एक शाम प्रार्थना के समय स्वामी जी के मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था।
उन्होंने शिष्यों को बुलाकर कहा: “तुम लोग जिस मोक्ष को ध्यान में खोज रहे थे, क्या उसे इस मुस्कुराते हुए स्वस्थ बच्चे के चेहरे में नहीं देख पा रहे? याद रखना, परमात्मा को ऊपर देखने की आवश्यकता नहीं है, वह तुम्हारे नीचे गिरे हुए भाई की सेवा में खड़ा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हाथों में माला और जुबां पर राम का नाम तब तक फलदायी नहीं होता, जब तक उन हाथों से किसी गिरते हुए को सहारा न मिले।








