धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 769

प्राचीन समय की बात है। एक समृद्ध नगर था, जहाँ एक अत्यंत धनी सेठ रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति, बहुमूल्य आभूषण, रेशमी वस्त्र, ऊँचे महल और हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ थीं। नगर में लोग उसे बड़े सम्मान से देखते थे, परंतु उस सेठ के मन में एक गहरा भ्रम घर कर गया था— “मेरे पास इतना धन है, इसलिए मैं दूसरों से श्रेष्ठ और महान हूँ।”

उसका व्यवहार धीरे-धीरे कठोर और अहंकारी हो गया। गरीबों की पीड़ा उसे दिखाई नहीं देती थी, और साधारण जीवन जीने वालों को वह तुच्छ समझने लगा।

एक दिन नगर में एक संत का आगमन हुआ। संत के पास न कोई धन था, न वैभव—सिर्फ एक झोला, साधारण वस्त्र और चेहरे पर अद्भुत शांति। आश्चर्य की बात यह थी कि नगर के लोग सेठ के महल की बजाय संत के पास अधिक जाने लगे। वहाँ उन्हें शांति, संतोष और जीवन का सही मार्ग मिल रहा था।

यह देखकर सेठ का अहंकार आहत हो गया। वह स्वयं संत के पास पहुँचा और बोला, “महात्मन्! मेरे पास धन है, सत्ता है, साधन हैं—फिर भी लोग आपकी ओर अधिक आकर्षित क्यों होते हैं? आप में ऐसा क्या है जो मुझमें नहीं?”

संत ने करुणा भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा और शांत स्वर में बोले, “सेठ जी, धन केवल सुविधा देता है, महानता नहीं। महान वही होता है जिसके विचार ऊँचे हों, जिसका हृदय करुणा से भरा हो और जिसका जीवन दूसरों के लिए उपयोगी हो।”

फिर संत ने आगे कहा— “जिस धन से अहंकार जन्म ले, वह मनुष्य को छोटा बना देता है। और जिस ज्ञान से अहंकार समाप्त हो जाए, वही मनुष्य को महान बनाता है।”

संत की वाणी सेठ के हृदय को छू गई। उसे पहली बार समझ आया कि उसकी महँगी वस्तुएँ और वैभव केवल बाहरी चमक हैं। यदि हृदय खाली है, तो सोने का महल भी सूना ही होता है।

उस दिन से सेठ का जीवन बदल गया। उसने धन को अपना स्वामी नहीं, बल्कि साधन बना लिया। वह सेवा, दान और सदाचार के मार्ग पर चल पड़ा। अब लोग उसका सम्मान उसके धन के कारण नहीं, बल्कि उसके विनम्र स्वभाव और सेवा-भाव के कारण करने लगे।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, यह एक बड़ा भ्रम है कि अधिक धन-संपत्ति और महँगी वस्तुएँ व्यक्ति को महान बना देती हैं। सच्ची महानता विचारों की पवित्रता, कर्मों की शुद्धता और हृदय की उदारता में होती है। धन का सही मूल्य तब है, जब वह समाज और मानवता के काम आए।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—254

नवरात्र तीसरा दिन : मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें मंत्र, भोग और पूजा विधि

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—177