बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव के किनारे एक छोटा-सा आश्रम था। वहाँ एक संत रहते थे, जिनके पास लोग अपने दुख, भय और असफलताओं की बातें लेकर आते थे। उसी गाँव में एक युवक रहता था—मेहनती था, पर भीतर से टूटा हुआ। वह मान चुका था कि उसका जीवन बस संघर्ष के लिए ही बना है।
हर सुबह वह आश्रम के बाहर बैठता और ईश्वर से शिकायत करता, “मेरे भाग्य में ही कुछ नहीं लिखा। मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर भी मेरा जीवन क्यों नहीं बदलता?”
एक दिन संत ने उसे पास बुलाया और बड़े स्नेह से पूछा, “बेटा, तुम जीवन में क्या बनना चाहते हो?”
युवक कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “महाराज, चाहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ, पर सपने देखने से डर लगता है। अगर सपना टूट गया तो?”
संत मुस्कुराए और बोले, “बेटा, जो सपना देखने से डरता है, वह जीवन जीने से भी डरता है। याद रखो—सपने टूटते नहीं हैं, वे हमें मजबूत बनाते हैं।”
संत उसे आश्रम के पीछे ले गए। वहाँ एक बीज बोया गया था। संत ने पूछा, “क्या यह बीज आज ही फल देगा?”
युवक बोला, “नहीं महाराज, समय लगेगा।”
संत बोले, “तो फिर तुम अपने जीवन से बिना बीज बोए फल की उम्मीद क्यों करते हो? सपना ही वह बीज है, जिसे बोए बिना सफलता का वृक्ष नहीं उगता।”
उस दिन युवक के भीतर कुछ जागा। उसने पहली बार अपने मन में साफ-साफ सपना देखा—ईमानदारी से आगे बढ़ने का, अपने परिवार का सहारा बनने का, समाज में कुछ अच्छा करने का। अब वह हर दिन थोड़ा-थोड़ा प्रयास करने लगा। असफलता आई, लोग हँसे, पर उसका सपना अब जीवित था।
समय बीतता गया। वही युवक, जो कभी खुद को कमजोर समझता था, अब दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया। एक दिन वह फिर संत के पास आया। आँखों में कृतज्ञता थी। उसने कहा, “महाराज, मेरे सपने सच हो गए।”
संत ने शांत भाव से उत्तर दिया, “नहीं बेटा, पहले तुम्हारी सोच बदली, फिर तुम्हारा जीवन बदला। सपने सच नहीं होते, उन्हें सच किया जाता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब तक मन में सपना नहीं जागता, तब तक भाग्य भी सोया रहता है। और जिस दिन सपना जाग जाता है, उसी दिन से जीवन बदलने लगता है।








