धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—813

एक समय की बात है, पहाड़ों की तलहटी में एक प्रसिद्ध आश्रम था। वहाँ एक युवक आया जो गहरे अवसाद और हताशा में डूबा था। वह घंटों एक ही जगह बैठा रहता और शून्य में ताकता रहता। उसके पास योग्यता थी, शिक्षा थी, लेकिन उसके कदम जैसे जंजीरों से बंधे थे।

एक शाम उसने संत से पूछा, “महाराज, मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए, पर मैं हिल नहीं पाता। हार जाने का डर और भविष्य की चिंता मुझे भीतर से खोखला कर रही है। मैं बस सोचता रहता हूँ और जितना सोचता हूँ, उतना ही कमजोर महसूस करता हूँ।”

संत ने उसे देखा और कहा, “कल सुबह मेरे साथ पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर तक चलना, वहीं तुम्हें तुम्हारे मर्ज की दवा मिलेगी।”

अगली सुबह जब चलने का समय आया, तो संत ने युवक को एक बड़ा और भारी पत्थर उठाने को कहा। युवक हैरान था, पर उसने पत्थर उठा लिया। जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ने लगे, युवक की सांस फूलने लगी। वह बार-बार रुकता और सोचता कि ‘अभी तो बहुत चढ़ाई बाकी है, मैं कैसे पहुँचूँगा? यह पत्थर कितना भारी है! अगर मैं गिर गया तो?’

आधे रास्ते में ही वह थककर बैठ गया और बोला, “महाराज, मैं और नहीं चल सकता। चोटी बहुत दूर है और यह पत्थर बहुत भारी। मेरी हिम्मत जवाब दे रही है।”

संत ने शांत भाव से कहा, “पुत्र, इस पत्थर को यहीं जमीन पर रख दो।”
युवक ने जैसे ही पत्थर रखा, उसे अद्भुत शांति और हल्कापन महसूस हुआ। संत ने कहा, “यह पत्थर तुम्हारी ‘अतीत की गलतियाँ’ और ‘भविष्य की चिंताएं’ हैं। तुम इन्हें ढोते हुए चढ़ाई (तरक्की) करने की सोच रहे हो, इसलिए थक रहे हो। अब बिना पत्थर के सिर्फ अगले 10 कदम देखो, पूरी चोटी को मत देखो।”

युवक बिना पत्थर के चलने लगा। अब उसका ध्यान केवल अपने अगले कदम पर था। जैसे ही उसने चलना शुरू किया, उसके शरीर में रक्त का संचार बढ़ा, ताजी हवा फेफड़ों में गई और अचानक उसे महसूस हुआ कि उसकी हताशा गायब हो रही है।

जब वे चोटी पर पहुँचे, तो संत ने उसे एक गहरी बात समझाई: “जब तुम नीचे बैठकर सोच रहे थे, तब तुम्हारी पूरी ऊर्जा ‘कल्पना’ में नष्ट हो रही थी। हताशा हमेशा खाली मन में घर करती है। लेकिन जैसे ही तुमने ‘हरकत’ शुरू की, तुम्हारी ऊर्जा ‘कर्म’ में बदल गई। याद रखना, चलते हुए पैर कभी सड़ते नहीं, लेकिन रुका हुआ पैर सुन्न हो जाता है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, खाली बैठना एक दलदल की तरह है, आप जितना सोचेंगे उतना धंसते जाएंगे। लेकिन एक छोटा सा ‘एक्शन’ उस दलदल से बाहर निकलने वाली रस्सी है। जब आप हाथ-पैर हिलाते हैं, तो ब्रह्मांड भी आपकी मदद करने लगता है।

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