बहुत समय पहले एक गाँव में आरव नाम का युवक रहता था। वह मेहनती था, सपने भी बड़े थे… लेकिन हर बार जब वह कुछ नया शुरू करता, उसे रुकावटें मिलतीं। कभी व्यापार में नुकसान, कभी परीक्षा में असफलता, कभी अपने ही लोग उसका मज़ाक उड़ाते। धीरे-धीरे उसने मान लिया — “शायद किस्मत ही खराब है।”
एक दिन वह पास के आश्रम में एक संत के पास पहुँचा। उसकी आँखों में निराशा थी। उसने कहा — “गुरुजी, मैं हार चुका हूँ। जितना कोशिश करता हूँ, उतना ही गिर जाता हूँ।”
संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ खेतों की ओर ले गए।
संत ने मिट्टी में दबा एक छोटा-सा बीज दिखाया और बोले, “तुम्हें क्या लगता है, इस बीज के साथ क्या हो रहा है?”
आरव बोला, “यह तो अंधेरे में दबा हुआ है… शायद खत्म हो रहा होगा।”
संत ने कहा, “नहीं… यह खत्म नहीं हो रहा, बल्कि टूटकर अंकुर बनने की तैयारी कर रहा है। अगर यह संघर्ष न सहता, तो कभी पेड़ नहीं बनता।”
फिर संत उसे नदी किनारे ले गए। वहाँ एक चिकना, चमकदार पत्थर पड़ा था। संत बोले, “यह पहले बहुत खुरदुरा था। लेकिन सालों तक पानी की लहरों और टकरावों ने इसे सुंदर बना दिया।”
आश्रम लौटते समय संत ने एक धनुष उठाया और तीर को पीछे खींचा।
आरव बोला, “गुरुजी, आप तीर को पीछे क्यों ले जा रहे हैं?”
संत ने तीर छोड़ा — वह दूर जाकर लक्ष्य पर लगा।
संत ने आरव से कहा — “जिसे तुम हार समझ रहे हो, वह असल में सीख है। बिना संघर्ष की जीत जल्दी भूल जाती है… लेकिन मुश्किलों से मिली जीत इंसान को गहराई और आत्मविश्वास देती है।”
आरव की सोच बदल गई। उसने अपनी असफलताओं को दुश्मन नहीं, गुरु मान लिया। समय के साथ वही युवक सफल हुआ — और दूसरों को भी यही सीख देने लगा कि
“रुकावटें रास्ता नहीं रोकतीं… वे रास्ता मजबूत बनाती हैं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, याद रखना—जो पल पीछे धकेलते हैं, वही हमें बड़ी छलांग के लिए तैयार करते हैं। जीवन की कठिनाइयाँ हमें तराशती हैं। जीवन में आने वाली रुकावट हमें दबाती नहीं, भीतर से मजबूत बनाती है।








