एक नगर में एक धनवान व्यापारी रहता था। वह हर साल गंगा स्नान करने अवश्य जाता। यात्रा से पहले वह दान-पुण्य करता, धार्मिक वस्त्र पहनता और लोगों को बताता— “गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं।”
परंतु नगर लौटते ही उसका व्यवहार फिर वैसा ही हो जाता— तोल में कमी, क्रोध में कठोर वाणी, और लाभ के लिए दूसरों को छलना।
एक बार गंगा घाट पर उसकी भेंट एक वृद्ध संत से हुई।
व्यापारी ने गर्व से कहा— “महाराज! मैं हर वर्ष गंगा स्नान करता हूँ, इसलिए निश्चिंत रहता हूँ कि मेरे पाप नष्ट हो जाते हैं।”
संत ने मुस्कराकर एक प्रश्न किया— “पुत्र, जब तुम स्नान करके निकलते हो, तो क्या गंगा तुम्हारा स्वभाव भी बदल देती है?”
व्यापारी ने कहा— “स्वभाव? वह तो जीवन की मजबूरी है।”
संत ने पास पड़े एक मैले वस्त्र को उठाया और बोले— “यदि कपड़ा धोकर फिर कीचड़ में डाल दिया जाए, तो क्या वह स्वच्छ रहेगा?”
फिर संत ने समझाया— “गंगा स्नान शरीर को शुद्ध करता है, पर मन और कर्म को शुद्ध करने के लिए ईमानदारी, दया और संयम का जल चाहिए।”
संत ने एक और उदाहरण दिया— “एक कसाई प्रतिदिन गंगा स्नान करता है, और एक किसान कभी गंगा नहीं गया, पर यदि किसान किसी का हक नहीं मारता, सच बोलता है और परिश्रम से जीवन जीता है— तो बताओ, सच्चा पवित्र कौन है?”
व्यापारी का सिर झुक गया।
संत ने आगे कहा— “पाप तब बनता है जब हम जानते हुए भी गलत करते हैं। और पुण्य तब बनता है जब कोई देखे या न देखे, हम सही मार्ग नहीं छोड़ते।”
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा— “जो व्यक्ति माता-पिता का सम्मान करता है,स्त्री को दृष्टि नहीं, श्रद्धा से देखता है, पराए धन पर नजर नहीं रखता और अहंकार छोड़कर कर्म करता है—उसका जीवन ही गंगा बन जाता है।”
उस दिन व्यापारी को सत्य समझ आया। वह जान गया कि पाप गंगा स्नान से नहीं,बल्कि कर्मों की शुद्धता से दूर होते हैं।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, धार्मिक कर्म आचरण से रहित हों तो दिखावा बन जाते हैं, और साधारण जीवन भी यदि सत्य और करुणा से भरा हो, तो वही सच्चा पुण्य है।








