एक समय की बात है। एक वन-आश्रम के पास दो संत साधना और सेवा के लिए आए। दोनों ही त्यागी थे, अनुशासित थे और परिश्रम से कभी पीछे नहीं हटते थे।
पहले संत का स्वभाव था—अधिक से अधिक मेहनत करना। वह मानते थे कि जितना ज्यादा श्रम होगा, उतनी जल्दी ईश्वर की कृपा और सफलता मिलेगी। दूसरे संत का स्वभाव था—सोच-समझकर मेहनत करना। वह कोई भी कार्य शुरू करने से पहले उद्देश्य, दिशा और परिणाम पर विचार करते थे।
एक दिन आश्रम में जल की भारी कमी हो गई। गुरु ने कहा, “जो संत सबसे पहले जल की व्यवस्था करेगा, वही आश्रम की बड़ी सेवा करेगा।”
पहला संत तुरंत फावड़ा उठाकर आश्रम के सामने ही कुआँ खोदने लगा। सुबह से शाम तक वह मिट्टी निकालता रहा, हाथों में छाले पड़ गए, शरीर थक गया, पर वह रुका नहीं। दूसरा संत जंगल की ओर गया, भूमि को परखा, पुराने वृक्षों की जड़ों को देखा, मिट्टी को सूँघा, पक्षियों की गतिविधि पर ध्यान दिया और फिर एक स्थान तय किया।
तीन दिन बीत गए। पहला संत गहराई तक खोद चुका था, पर वहाँ सिर्फ पत्थर और सूखी मिट्टी थी। दूसरे संत ने कम गहराई में ही मीठा जल पा लिया।
थका-हारा पहला संत दूसरे के पास आया और बोला, “मैंने तुमसे अधिक मेहनत की, फिर भी मुझे सफलता क्यों नहीं मिली?”
दूसरे संत ने शांत स्वर में कहा,“मेहनत मेरी भी थी, लेकिन मैंने पहले सही दिशा चुनी।”
तभी गुरु वहाँ आए और बोले— “बिना दिशा की मेहनत ऐसे है जैसे अँधेरे में दौड़ना—थकान तो होगी, मंज़िल नहीं। और सही दिशा में किया गया थोड़ा सा प्रयास भी बड़े परिणाम देता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जो केवल मेहनत करता है, वह श्रमिक बनता है। जो सही दिशा में मेहनत करता है, वही सफल साधक बनता है। सफलता पसीने की मात्रा से नहीं, पसीने की सही दिशा से मिलती है।








