एक बार एक आश्रम में एक युवा शिष्य आया। वह शास्त्रों का अच्छा ज्ञाता था— उसे गीता के श्लोक कंठस्थ थे, उपनिषदों की पंक्तियाँ याद थीं। पर उसके जीवन में क्रोध, अहंकार और असंतोष भरा हुआ था।
संत ने मुस्कराकर कहा— “वत्स, ज्ञान जमा करने की वस्तु नहीं, जीने की कला है।”
शिष्य को समझाते हुए कहा— “मान ले, तेरे पास हजारों बीज हैं, पर तू उन्हें गोदाम में ही रखे— न बोए, न सींचे— तो क्या फसल होगी?”
शिष्य बोला— “नहीं गुरुदेव।”
संत ने कहा— “वैसे ही ज्ञान यदि दिमाग में बंद रहे और आचरण में न उतरे,तो जीवन में कोई फल नहीं देता।”
संत ने आगे कहा— “आग के गुण सब जानते हैं—वह गर्मी देती है, पकाती है, जीवन चलाती है।
पर यदि कोई आग के पास बैठे ही नहीं तो क्या ठंड दूर होगी?”
शिष्य चुप हो गया।
संत बोले— “ज्ञान आग जैसा है। जब तक तू उसे अपने व्यवहार के पास नहीं लाएगा,तब तक वह तुझे नहीं बदलेगा।”
संत ने अंतिम उदाहरण दिया— “एक रोगी डॉक्टर से दवा लेकर केवल उसके नाम और गुण रटता रहे, पर दवा खाए नहीं— तो क्या वह स्वस्थ होगा?”
शिष्य ने सिर झुका लिया।
संत ने कहा— “ज्ञान दवा है। उसे जीवन में उतारना ही उपचार है।”
संत ने करुणा से कहा— “ज्ञान बोलने से नहीं, जीने से सिद्ध होता है। जो ज्ञान को कर्म में बदल देता है, वही सच्चा ज्ञानी है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब तक अपने आचरण पर ध्यान नहीं देंगे जीवन में बदलाव नहीं आ सकता। यदि कोई अपने गुरु का आदेश मानकर स्वयं को धार्मिक बनाने के लिए मंदिर में जाकर नित्य प्रसाद चढ़ाता है। लेकिन कर्म अपवित्र करता है और वाणी कटु प्रयोग करता है तो कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता। वह रंग चढ़ा सियार ही बनेगा, धार्मिक कभी नहीं बन पाएगा। उसके जीवन में कभी भी क्रांति नहीं होगी। वो ऐसा करके स्वयं को ही धोखा देता है, जबकि ईश्वर उसकी सच्चाई को देख रहे होते हैं। इसलिए अपने आचरण को सुधारों। गुरु जो ज्ञान देते है उनको अपने जीवन में उतारों। तभी आपका गुरु ज्ञान सार्थक होगा।








