धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—779

एक बार समुद्री यात्रा के दौरान जहाज तेज़ तूफान में फँस गया। लोग घबरा गए, प्रार्थनाएँ करने लगे। पर नरेंद्रनाथ शांति से बैठे बोले— “डर किस बात का? अगर मरना लिखा है तो टल नहीं सकता, और अगर नहीं लिखा तो डर बेकार है।” उन्होंने कहा— भय कल्पना में होता है, साहस निर्णय में।

1893 में, शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के पास न पैसा था, न पहचान, न निमंत्रण पत्र। कई बार अपमानित हुए, दरवाज़े बंद हुए।

पर उन्होंने कहा— “अगर एक भी दरवाज़ा खुला है, तो वही मेरे लिए पर्याप्त है।”

और जब मंच मिला तो उन्होंने कहा— “मेरे अमेरिका के भाइयों और बहनों…” पूरी सभा खड़ी हो गई—तालियों की गड़गड़ाहट से। उसके बाद स्वामी विवेकानंद ने अपने विचार प्रकट किए तो पूरा विश्व उनका कायल हो गया। उनके जीवन के इस प्रकरण से हमें सीख मिलती है कि आत्मविश्वास हो तो दुनिया सुनने को मजबूर होती है।

एक बार विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से सीधा प्रश्न किया— “क्या आपने ईश्वर को देखा है?”

रामकृष्ण बोले— “हाँ, उतना ही स्पष्ट जितना तुम्हें देख रहा हूँ।”

उस क्षण विवेकानंद समझ गए— सच्चा ज्ञान अनुभव से आता है, किताबों से नहीं। जो बच्चा, युवा या जिज्ञासु सवाल करेगा वही सही ज्ञान को प्राप्त कर सकेगा। जो सवाल नहीं करते,उनका ज्ञान वही ठहर जाता है।

स्वामी विवेकानंद कहते थे—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह केवल नारा नहीं, उनका जीवन था।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें सयीख मिलती है कि डर तुम्हें रोकता है, साहस तुम्हें बनाता है। हालात नहीं, आत्मविश्वास भविष्य तय करता है। भीड़ भेड़ की तरह चलती है, सिंह अकेला चलता है। खुद को कमजोर मत समझो — तुम्हारे भीतर भी वही शक्ति है, जो किसी अन्य ताकतवर में है।

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Jeewan Aadhar Editor Desk