एक समय की बात है। एक नगर के बाहर एक आश्रम में एक महात्मा रहते थे। वे अपने सरल जीवन, सच्चे वचनों और गहरी समझ के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनके पास आने वाला हर व्यक्ति जानता था कि महात्मा केवल सत्य और साफ़ मन की बात को ही महत्व देते हैं।
उसी नगर में एक व्यक्ति रहता था, जो बहुत चालाक था। वह सीधे झूठ बोलने से बचता था, लेकिन ऐसे शब्दों का प्रयोग करता था जिनसे सामने वाला भ्रम में पड़ जाए। वह आधा सच, आधा झूठ और मीठी भाषा मिलाकर अपना काम निकलवा लेता था। लोग कहते थे— “यह झूठा नहीं है, पर इसकी बातों में सच्चाई भी पूरी नहीं होती।”
एक दिन वह व्यक्ति महात्मा के पास आया और बोला, “महाराज, मैं किसी का हक़ नहीं मारता, बस व्यापार में थोड़ा समझदारी से बोलना पड़ता है।”
महात्मा समझ गए। उन्होंने पूछा, “तुम अनाज कैसे बेचते हो?”
वह बोला, “मैं तौल में पूरा ही देता हूँ… बस तराज़ू कभी-कभी अपने आप हल्का हो जाता है।”
महात्मा मुस्कुराए और बोले, “वत्स, जब तुम ‘अपने आप’ जैसे शब्द जोड़ते हो, तो वही शब्द तुम्हारी बेईमानी को ढँकने लगते हैं।”
महात्मा ने उसे एक और कहानी सुनाई। एक व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा— “मैं कल तुम्हारी मदद करने की पूरी कोशिश करूँगा।”
अगले दिन वह मदद के लिए नहीं आया। जब मित्र ने पूछा तो बोला, “मैंने कोशिश करने की बात कही थी, करने की नहीं।”
महात्मा बोले, “ऐसे शब्द रिश्तों को तोड़ते हैं। बाहर से वचन पूरे लगते हैं, पर भीतर से खोखले होते हैं।”
महात्मा ने उस चालाक व्यक्ति से कहा, “देखो, कुछ लोग बेईमान शब्दों को इस तरह सजा लेते हैं कि वे झूठ भी न लगें और सच भी न बनें। ऐसे शब्दों से काम तो निकल जाता है, लेकिन विश्वास मर जाता है। जब विश्वास मरता है, तब आदमी अकेला रह जाता है।”
फिर उन्होंने पास पड़े पानी से भरे घड़े की ओर इशारा किया और बोले, “अगर पानी साफ़ है, तो घड़ा दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन जब पानी गंदा हो, तब ऊपर से ढक्कन और सजावट लगानी पड़ती है। शब्दों की सजावट भी तभी होती है, जब मन साफ़ नहीं होता।”
उस व्यक्ति की आँखें खुल गईं। उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी तथाकथित समझदारी उसे भीतर से खाली बना रही है। उसने महात्मा के चरणों में बैठकर कहा, “महाराज, आज से मैं साफ़ शब्दों में ही बोलूँगा, चाहे नुकसान ही क्यों न हो।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, बेईमान शब्द तात्कालिक लाभ दिला सकते हैं, लेकिन सच्चे शब्द जीवन भर का सम्मान दिलाते हैं। जो शब्द मन से निकलते हैं, वही अंत में मन को शांति देते हैं।








