धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज —794

एक गाँव में एक साधक रहता था। लोग उसे संत कहते थे, क्योंकि उसके शब्द सरल थे, पर असर गहरा। एक दिन दो युवक उसके पास आए। दोनों की उम्र, मेहनत और हालात लगभग समान थे—पर जीवन अलग-अलग दिशाओं में जा रहा था।

पहला युवक बोला, “महाराज, मैं बहुत परिश्रम करता हूँ, फिर भी मन में भय रहता है—कहीं असफल न हो जाऊँ। लोगों से तुलना करता हूँ, ईर्ष्या भी हो जाती है।”

दूसरा बोला, “मैं भी मेहनत करता हूँ, पर मन में यह इच्छा रहती है कि जो मिले, उसमें सीखूँ और आगे बढ़ूँ।”

संत मुस्कराए। पास पड़ी मिट्टी की दो छोटी क्यारियाँ दिखाकर बोले, “इनमें बीज डालो।”
पहले युवक ने काँटेदार पौधे का बीज चुना—सोचा, ‘कम से कम कोई पास नहीं आएगा।’
दूसरे ने फूलों का बीज चुना—सोचा, ‘खुशबू फैलेगी, लोग मुस्कराएँगे।’

समय बीता। पहली क्यारी में काँटे उग आए—न खुद चैन, न कोई पास।
दूसरी में फूल खिले—हवा महकी, तितलियाँ आईं, राहगीर ठहरे।

संत बोले, “तुम्हारा जीवन भी ऐसी ही क्यारी है। विचार बीज हैं, इच्छाएँ पानी। भय, ईर्ष्या और तुलना बोओगे—काँटे उगेंगे। सीख, कृतज्ञता और सेवा बोओगे—फूल खिलेंगे।”

पहला युवक समझ गया। उसने अपने विचार बदले—हर दिन एक अच्छा विचार बोने लगा, छोटी-छोटी इच्छाएँ शुद्ध करने लगा। कुछ समय बाद उसके चेहरे पर शांति दिखने लगी।

संत ने अंत में कहा, “परिस्थितियाँ बाहर से आती हैं, पर जीवन का स्वरूप भीतर से बनता है।
जो भीतर बोओगे, वही बाहर पाओगे।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अपने विचारों और इच्छाओं का चयन सावधानी से करें—यही आपके जीवन की दिशा तय करते हैं।

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