एक छोटा सा गाँव था जहाँ राघव नाम का एक लड़का रहता था। राघव को चित्रकारी का बहुत शौक था। उसके हाथों में जादू था; वह जब कैनवास पर ब्रश चलाता, तो तस्वीरें बोल उठती थीं। उसका सपना था कि वह देश का सबसे बड़ा कलाकार बने।
लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था। एक भयानक दुर्घटना में राघव ने अपना दायां हाथ खो दिया—वही हाथ जिससे वह पेंटिंग करता था।
गाँव वाले, रिश्तेदार और दोस्त सब अफ़सोस जताने आए। एक बुजुर्ग ने राघव के पिता से कहा, “बेचारे की किस्मत फूट गई। जिस हाथ में हुनर की लकीर थी, वही हाथ चला गया। अब यह ज़िंदगी भर क्या करेगा?”
राघव ने यह सुना और टूट गया। वह कई महीनों तक कमरे में बंद रहा। कैनवास धूल खा रहे थे और रंग सूख रहे थे। वह बार-बार अपने कटे हुए हाथ को देखता और सोचता कि अब मेरा कोई भविष्य नहीं है।
एक दिन उनके परिवारिक गुरु उनके घर पर आए। राघव ने अपनी परेशानी उनके सामने रखी। राघव ने कहा—गुरु जी जिस हाथ में हुनर था वो कट गया। अब मेरे जीवन का कोई महत्व नहीं बचा। मेरी किस्मत की लकीरें अब मिट चुकी है।
गुरु जी शांत भाव से उसे उसके कमरे में एक चींटी को अपने से दोगुने वजन का दाना लेकर दीवार पर चढ़ने की कोशिश करते हुए दिखाया। वह कई बार गिरी, लेकिन रुकी नहीं। अंत में, वह ऊपर पहुँच ही गई। राघव को झटका लगा। गुरु जी ने कहा, “इस नन्हे जीव के पास तो कोई मार्गदर्शक नहीं है, फिर भी यह अपनी मंज़िल तक पहुँच गई। क्योंकि इसके पास मंजिल तक पहुंचने का जनून है। ये किस्मत की लकीरों पर नहीं, बल्कि अपनी मेहनत पर यकीन करती है।”
उसी दिन, राघव ने अपना ब्रश उठाया—लेकिन इस बार अपने बाएं हाथ से।
शुरुआत बहुत मुश्किल थी। हाथ कांपता था, लकीरें टेढ़ी-मेढ़ी बनती थीं। लोग हँसते थे, “अरे, अब बाएं हाथ से क्या खाक बनाएगा?” लेकिन राघव ने कानों पर नहीं, अपने कर्म पर भरोसा किया।
पूरे तीन साल की कड़ी तपस्या के बाद, राघव ने एक पेंटिंग बनाई और उसे राज्य की सबसे बड़ी प्रदर्शनी में भेजा।
परिणाम वाले दिन, जज ने पर्दा हटाया और विजेता का नाम पुकारा—”राघव!”
पूरी हॉल तालियों से गूंज उठी। जब राघव स्टेज पर अपना इनाम लेने गया, तो लोग हैरान रह गए क्योंकि उसका दायां हाथ ही नहीं था।
एक पत्रकार ने उससे पूछा, “राघव जी, आपने अपना वो हाथ खो दिया जिसमें आपकी सफलता की लकीरें थीं, फिर आप यहाँ तक कैसे पहुँचे?”
राघव मुस्कुराया और माइक थाम कर बोला: “साहब, जब मेरा हाथ कटा, तो मुझे लगा मेरी तकदीर कट गई। लेकिन फिर मुझे मेरे गुरु जी ने समझाया कि लकीरें हाथों में होती हैं, लेकिन तकदीर ‘हौसलों’ में होती है। मैंने अपनी तकदीर लकीरों से नहीं, अपनी मेहनत के पसीने से लिखी है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हालात चाहे कितने भी बुरे क्यों न हो जाएं, जब तक आपकी इच्छाशक्ति जिंदा है, आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं। किसी के कह देने से या किसी कमी के आ जाने से आपकी कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि एक नया और बेहतर अध्याय शुरू होता है।








