धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 842

एक बार की बात है। हिमालय के पास एक छोटे से आश्रम में एक संत रहते थे। दूर-दूर से लोग उनके पास अपने जीवन की समस्याएँ लेकर आते थे। एक दिन एक युवक बहुत परेशान होकर संत के पास पहुँचा।

युवक बोला, “गुरुदेव, मेरे जीवन में सब कुछ उल्टा ही हो रहा है। जो सोचता हूँ वह होता नहीं, और जो नहीं चाहता वही हो जाता है। समझ नहीं आता कि सही निर्णय कैसे लूँ।”

संत मुस्कुराए और उसे पास बैठाकर बोले, “पहले मेरे साथ चलो।”

वे उसे आश्रम के पीछे एक बगीचे में ले गए। वहाँ एक छोटा-सा पेड़ था, जिसकी कुछ टहनियाँ सूखी थीं और कुछ पर हरे पत्ते लगे थे।

संत ने पूछा, “तुम्हें यह पेड़ कैसा लग रहा है?”

युवक बोला, “गुरुदेव, यह पेड़ तो आधा सूखा है। लगता है यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा।”

संत ने कहा, “ठीक से देखो।”

युवक ने फिर देखा तो पाया कि सूखी टहनियों के बीच कई नई कोपलें भी निकल रही थीं।

संत बोले, “जीवन भी इसी पेड़ की तरह होता है। कुछ हिस्से सूखते हैं, कुछ हिस्से नए बनते हैं। यदि तुम केवल सूखी टहनियाँ देखोगे, तो तुम्हें जीवन निराशाजनक लगेगा। लेकिन अगर नई कोपलों को देखोगे, तो तुम्हें उम्मीद दिखाई देगी।”

फिर संत ने एक गिलास में आधा पानी भरकर युवक को दिया और पूछा, “यह गिलास कैसा है?”

युवक बोला, “आधा खाली।”

संत मुस्कुराए और बोले, “यही तुम्हारी समस्या है। जब तक तुम जीवन को ‘आधा खाली’ मानते रहोगे, तब तक निर्णय भी डर और निराशा से लोगे। लेकिन अगर जीवन को ‘आधा भरा’ मानकर स्वीकार करोगे, तो तुम्हारे निर्णय समझदारी और सकारात्मक सोच से होंगे।”

संत ने अंत में कहा— “जीवन को बदलने से पहले उसे समझना सीखो। जो जैसा है, उसे वैसा स्वीकार करो। फिर सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ो। तभी तुम्हें सही रास्ता और सही निर्णय दोनों मिलेंगे।”

युवक की आँखों में चमक आ गई। उस दिन उसे समझ आ गया कि समस्या जीवन में नहीं, बल्कि देखने के नजरिए में होती है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, सकारात्मक सोच का मतलब समस्याओं को नकारना नहीं, बल्कि जीवन को जैसा है वैसा समझकर सही निर्णय लेना है। जब दृष्टिकोण बदलता है, तब रास्ते अपने-आप दिखाई देने लगते हैं।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी के प्रवचनों से—143

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—498

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 138