धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 843

पुराने समय में एक छोटे से राज्य के राजा प्रजा के हाल जानने के लिए समय-समय पर घूमता था। एक दिन राजा घूमते-घूमते एक भिखारी के पास पहुंचा। उसने भिखारी से कहा, “भैया, मुझे थोड़ा सा अनाज दे दो। मेरे गुरु ने कहा है कि इससे मेरे राज्य का संकट दूर होगा।”

भिखारी हैरान रह गया। उसने सोचा, “एक राजा मुझसे भीख मांग रहा है। मैं मना कैसे करूं?” उसने अपनी झोली में हाथ डाला और मुट्ठी भर अनाज राजा को देने लगा, लेकिन मन ही मन वह सोचने लगा, “इतना अनाज राजा को दूंगा तो मेरे लिए क्या बचेगा। ज्यादा नहीं देना चाहिए।” इसलिए उसने अपनी मुट्ठी से कुछ अनाज झोली में ही छोड़ दिया और सिर्फ थोड़ा सा राजा को दे दिया।

राजा ने अनाज लेकर अपने मंत्री को दिया और कहा, “इस अनाज के बराबर का इनाम भिखारी को देना।” मंत्री ने भिखारी के लिए एक पोटली तैयार की और उसे दे दी। भिखारी जब घर आया, तो उसने पत्नी को पूरी बात बताई। पत्नी ने पोटली खोली और देखा कि उसमें सोने के सिक्के हैं।

भिखारी और उसकी पत्नी दोनों बहुत हैरान हुए। उन्हें समझ में आया कि अगर उन्होंने राजा को पूरा अनाज दिया होता, तो उन्हें और ज्यादा सोना मिलता। भिखारी को पछतावा हुआ कि उसने कंजूसी की। दोनों पति-पत्नी को समझ आ गया कि दान करते समय कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हमें दान देने की आदत बचपन से ही बच्चों में डालनी चाहिए। जरूरतमंद को खुश होकर देना चाहिए। छोटे दान में भी खुशी हो, लेकिन अपने सामर्थ्य के अनुसार दान देना चाहिए। खुशी से दिए गए दान से ही पुण्य मिलता है।

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