धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 650

गुरुकुल का समय था। द्वारका नरेश वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण और उनके भ्राता बलराम विद्या प्राप्त करने के लिए उज्जैन पहुँचे। वहाँ के प्रसिद्ध गुरु संदीपनी ऋषि के आश्रम में उन्होंने अन्य विद्यार्थियों की तरह ही रहकर शिक्षा ग्रहण की।

श्रीकृष्ण ने साधारण बालक की भाँति आश्रम के नियमों का पालन किया – कभी आश्रम की गायें चराई, तो कभी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं। वे विनम्र भाव से गुरु और गुरु माता की सेवा करते और बड़े ध्यान से वेद, उपनिषद, धनुर्विद्या, राजनीति, गणित और संगीत तक का ज्ञान प्राप्त करते।

कुछ ही समय में कृष्ण और बलराम ने वह सब कुछ सीख लिया, जिसे सीखने में साधारण छात्रों को कई वर्षों का समय लगता।

शिक्षा पूर्ण होने पर परंपरा के अनुसार गुरु-दक्षिणा देने का समय आया। गुरु संदीपनी ने कहा –
“वत्स! मुझे सोना, वस्त्र या धन नहीं चाहिए। मेरी गुरु-दक्षिणा यही है कि तुम मेरे उस पुत्र को वापस ला दो, जो समुद्र में डूबकर खो गया है।”

गुरु की यह मांग कठिन थी, परंतु शिष्यधर्म निभाना ही कृष्ण का कर्तव्य था। कृष्ण और बलराम समुद्र देवता के पास पहुँचे। समुद्र ने बताया कि गुरु-पुत्र को शंखासुर नामक दैत्य ने लिया है। दोनों ने शंखासुर का वध किया, परंतु उन्हें वहाँ भी गुरु-पुत्र नहीं मिला। तब वे यमराज के लोक तक पहुँचे और अपनी भक्ति व पराक्रम से यमराज को प्रसन्न किया। अंततः यमराज ने गुरु का पुत्र उन्हें सौंप दिया।

श्रीकृष्ण ने उस पुत्र को जीवित अवस्था में गुरु संदीपनी को सौंप दिया। अपने खोए हुए पुत्र को देखकर गुरु और गुरु माता की आँखें खुशी से भर आईं।

संदीपनी ऋषि ने भावविभोर होकर कहा – “वत्स! आज तुमने सिद्ध कर दिया कि सच्चा शिष्य वही है, जो अपने गुरु की आज्ञा के लिए असंभव को भी संभव बना दे। तुम्हारा नाम युगों-युगों तक धर्म की स्थापना करने वाले के रूप में लिया जाएगा।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, गुरु केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन की दिशा देते हैं। सच्चा शिष्य वही है, जो गुरु की इच्छा पूरी करने के लिए हर कठिनाई उठाए। गुरु और शिष्य का संबंध सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनभर के कर्तव्य और सम्मान से जुड़ा होता है।

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