एक समय की बात है। एक संत हिमालय की तलहटी में स्थित आश्रम में रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग मार्गदर्शन लेने आते थे। संत का उपदेश सदा एक ही रहता— “जीवन को शुद्ध बनाओ, पर स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भूल मत करना।”
उसी क्षेत्र में एक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत धार्मिक था— प्रतिदिन स्नान-ध्यान, यज्ञ-हवन, व्रत-उपवास, दान-पुण्य, गौ-सेवा, तीर्थ-यात्रा—सब कुछ करता था। लोग उसे महान पुण्यात्मा कहकर सम्मान देते थे। धीरे-धीरे यह सम्मान उसके मन में अहंकार में बदल गया। वह मन-ही-मन सोचने लगा— “मेरे जैसा धर्मात्मा इस नगर में कोई नहीं। भगवान भी मुझसे अवश्य प्रसन्न होंगे।”
एक दिन वह संत के पास पहुँचा और बोला, “महाराज! मैंने जीवन में कोई बड़ा पाप नहीं किया। मैं तो जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो चुका हूँ।”
संत ने शांति से पूछा, “क्या कभी क्रोध आया है?”
ब्राह्मण बोला, “आया है।”
“क्या कभी किसी को तुच्छ समझा?”
वह बोला, “हाँ, पापियों को तो समझता हूँ।”
संत हल्के से मुस्कराए, पर कुछ बोले नहीं।
अगले दिन संत उसे नगर के कारागार ले गए। वहाँ एक युवक बंद था, जिसने चोरी की थी। वह रो-रोकर प्रभु से प्रार्थना कर रहा था— “हे भगवान! भूख और गलत संगति में आकर मैंने पाप कर लिया। मुझे क्षमा कर दो। अब ऐसा जीवन नहीं जिऊँगा।”
ब्राह्मण ने कहा, “महाराज! यह तो पापी है, इससे दूर रहना चाहिए।”
संत बोले, “यह पापी अवश्य है, पर इसका हृदय टूट चुका है। इसे अपने दोष का बोध है। जहाँ पश्चाताप होता है, वहाँ परिवर्तन की संभावना जन्म लेती है।”
इसके बाद संत उसे मंदिर ले गए। वहाँ वही ब्राह्मण स्वयं पूजा कर चुका था। संत ने कहा,
“जब तुम पूजा करते हो और मन में यह भाव आता है कि ‘मैं सबसे बड़ा पुण्यात्मा हूँ’, उस क्षण तुम्हारा पुण्य अहंकार में बदल जाता है।”
उन्होंने समझाया— “जैसे दूध शुद्ध होता है, पर यदि उसमें नींबू पड़ जाए तो वही दूध फट जाता है, वैसे ही पुण्य शुद्ध होता है, पर उसमें अहंकार पड़ जाए तो वह बंधन बन जाता है।”
संत बोले, “एक पापी जानता है कि वह गलत है, इसलिए वह झुक सकता है। लेकिन जो अपने पुण्य पर गर्व करता है, वह स्वयं को सही मान लेता है—वह झुकेगा ही नहीं।
इसीलिए शास्त्र कहते हैं— पाप से आत्मा घायल होती है, पर अहंकार से आत्मा अंधी हो जाती है।”
ब्राह्मण की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, आज समझ आया कि मैंने दूसरों को पापी समझकर स्वयं सबसे बड़ा दोष कर लिया।”
संत ने करुणा से कहा, “सच्चा धर्म यह नहीं कि तुम कितने पुण्य करते हो, सच्चा धर्म यह है कि तुम कितना विनम्र रहते हो।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, पाप बुरा है, पर पश्चाताप उसे धो सकता है। पुण्य श्रेष्ठ है, पर अहंकार उसे नष्ट कर देता है। जो अपने दोष देखता है, वह आगे बढ़ता है। जो अपने पुण्य का ढिंढोरा पीटता है, वह वहीं रुक जाता है। पुण्य करो, पर उसका भार सिर पर मत रखो। नम्रता ही वह दीपक है, जो पुण्य को प्रकाश बनाता है।








