धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—829

बहुत समय पहले असुरों का एक पराक्रमी राजा था — हिरण्यकशिपु। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पाया कि वह न दिन में मरे, न रात में; न घर में, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न मनुष्य से, न पशु से।

वरदान पाकर वह अहंकारी हो गया और स्वयं को ही भगवान मानने लगा। उसने आदेश दिया कि राज्य में कोई भी भगवान विष्णु का नाम नहीं लेगा।

परंतु उसके ही घर में जन्म हुआ एक दिव्य आत्मा का — भक्त प्रह्लाद। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे हर समय “नारायण-नारायण” जपते रहते।

जब हिरण्यकशिपु ने देखा कि उसका पुत्र उसकी आज्ञा नहीं मान रहा, तो वह क्रोधित हो उठा।
उसने प्रह्लाद को कई बार मारने का प्रयास किया— ऊँचे पर्वत से गिरवाया, विषैले सर्पों के बीच डलवाया, हाथियों से कुचलवाने का प्रयास किया पर हर बार भगवान विष्णु ने अपने भक्त की रक्षा की।

हिरण्यकशिपु की बहन थी — होलिका। उसे वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती।

योजना बनी कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी। होलिका अग्नि में बैठ गई, प्रह्लाद भगवान का नाम जपते रहे।

परंतु हुआ उल्टा — होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए। क्योंकि वरदान का दुरुपयोग किया गया था। सत्य और भक्ति की जीत हुई।

अंत में भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया— आधा मनुष्य, आधा सिंह।
उन्होंने संध्या समय (न दिन न रात), द्वार की देहरी पर (न अंदर न बाहर), अपने नाखूनों से (न अस्त्र न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध किया।

इस प्रकार अहंकार का अंत हुआ और भक्ति की विजय।

होलिका दहन हमें यह संदेश देता है: अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है। सच्ची भक्ति की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। सत्य और विश्वास की जीत होती है।

इसीलिए होलिका दहन की रात हम बुराई को जलाकर, अग्नि की परिक्रमा कर, प्रह्लाद जैसी अटूट श्रद्धा का संकल्प लेते हैं।

भक्त प्रह्लाद धैर्य, विश्वास और निडर भक्ति के प्रतीक हैं। उनका पूजन करने से —मन में दृढ़ आस्था आती है। भय और नकारात्मकता दूर होती है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “जो सत्य के मार्ग पर अडिग रहता है, अग्नि भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।”

होलिका दहन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मा की विजय का उत्सव है — अहंकार की होली जलाकर, भक्ति का दीप जलाने का दिन।

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