धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 844

एक व्यक्ति समुद्र के किनारे घूम रहा था। मौसम बहुत सुहावना था। समुद्र की लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं। उस व्यक्ति की समुद्र में नहाने की इच्छा हुई। तभी उस व्यक्ति की नजर किनारे पर पड़ी एक चमकदार छड़ी पर गई। उसने उसे उठाकर देखा तो पता चला कि वह चांदी की छड़ी है।

व्यक्ति ने सोचा, “अगर मैं इस छड़ी को यहीं छोड़कर नहाने गया तो कोई इसे उठा ले जाएगा।” इसलिए वह छड़ी को अपने साथ लेकर ही समुद्र में नहाने चला गया।

वह आराम से पानी में नहा ही रहा था कि अचानक समुद्र में एक बड़ी लहर आई। उस तेज लहर के कारण उसके हाथ से छड़ी फिसल गई। देखते ही देखते वह छड़ी समुद्र की लहरों के साथ दूर बह गई और खो गई।

अब वह व्यक्ति बहुत दुखी हो गया। वह बार-बार समुद्र की तरफ देखने लगा और सोचने लगा कि काश उसकी छड़ी वापस मिल जाए। वह किनारे पर बैठकर उदास हो गया।

उसी समय वहां से एक संत गुजर रहे थे। उन्होंने उस व्यक्ति को दुखी देखा तो उसके पास आकर पूछा, “बेटा, तुम इतने परेशान क्यों बैठे हो?”

व्यक्ति ने दुखी होकर कहा, “मेरी चांदी की छड़ी समुद्र में बह गई है।”

संत ने पूछा, “तुम छड़ी लेकर समुद्र में नहाने क्यों गए थे?”

व्यक्ति बोला, “अगर मैं छड़ी को किनारे पर रखकर नहाने जाता तो कोई उसे उठा ले जाता।”

संत ने फिर पूछा, “तुम चांदी की छड़ी लेकर यहां क्यों आए थे?”

यह सुनकर व्यक्ति ने कहा, “मैं छड़ी लेकर नहीं आया था। मुझे यह छड़ी यहीं किनारे पर पड़ी हुई मिली थी।”

यह बात सुनते ही संत मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा, “जब वह छड़ी तुम्हारी थी ही नहीं, तो उसके खोने पर इतना दुख क्यों कर रहे हो?”

संत की बात सुनकर व्यक्ति को अपनी गलती समझ में आ गई। उसे एहसास हुआ कि वह उस चीज के लिए दुखी हो रहा था जो कभी उसकी थी ही नहीं। वह संत को प्रणाम करके शांत मन से अपने घर लौट गया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अक्सर लोग उन्हीं चीजों के लिए दुखी होते हैं जो वास्तव में उनकी होती ही नहीं। अगर हम अपने जीवन को समझदारी से जीना चाहते हैं तो जो चीज हमारे पास है, उसकी कद्र करें।

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