एक बार एक बहुत बड़े और अमीर सेठ थे, जिनका नाम करमचंद था। उनके पास धन-दौलत, बड़े-बड़े महल और नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन एक समस्या थी—उन्हें रात को नींद नहीं आती थी। उनके मन में हमेशा व्यापार की उधेड़बुन, किसी को नीचा दिखाने की योजना, या अपने धन को खोने का डर बना रहता था। उनका जीवन तनाव और बेचैनी से भरा हुआ था।
एक दिन उनके नगर में एक सिद्ध संत पधारे। सेठ करमचंद उनके पास गए और हाथ जोड़कर बोले, “महाराज! मेरे पास दुनिया की हर सुख-सुविधा है, लेकिन मेरे जीवन में न शांति है और न ही मुझे रात को नींद आती है। कृपया मुझे शांति का उपाय बताएँ।”
संत ने सेठ को ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “सेठ जी, इसका उपाय बहुत आसान है। आज रात आप मेरे साथ नदी पार उस छोटे से गाँव में चलिए। वहाँ एक गरीब किसान रहता है, दीनानाथ। आज रात हम उसी के मेहमान बनेंगे।”
सेठ हैरान हुए, लेकिन शांति की चाह में वे संत के साथ चल पड़े।
शाम ढलते ही वे दीनानाथ की झोपड़ी पर पहुँचे। दीनानाथ के पास कोई खास सुविधा नहीं थी, लेकिन उसने दोनों मेहमानों का बहुत ही प्रेम और उत्साह से स्वागत किया। उसने अपने खेत से ताज़ी सब्जियाँ तोड़ीं और बाजरे की सूखी रोटियाँ बनाकर उन्हें बड़े ही आदर से परोसीं।
भोजन के बाद, दीनानाथ ने ज़मीन पर एक फटी हुई चटाई बिछाई और भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, “हे प्रभु! तेरा लाख-लाख शुक्र है कि आज तूने मुझे दो संतों की सेवा करने का मौका दिया और भरपेट भोजन दिया।” यह कहकर वह चटाई पर लेटा और कुछ ही पलों में उसे गहरी नींद आ गई। उसके चेहरे पर एक अद्भुत सुकून था।
दूसरी ओर, सेठ करमचंद उस कठोर ज़मीन पर रात भर करवटें बदलते रहे।
सुबह होते ही सेठ ने संत से पूछा, “महाराज, इस गरीब के पास न तो अच्छा बिस्तर है, न स्वादिष्ट भोजन और न ही कोई संपत्ति। फिर भी यह इतनी गहरी और मीठी नींद कैसे सो गया? और मैं मखमली गद्दों पर भी नहीं सो पाता।”
संत ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “सेठ जी, दीनानाथ के पास चाहे धन न हो, लेकिन उसके पास सरलता और निष्कपटता की अनमोल दौलत है।
वह जो भीतर है, वही बाहर है। वह न तो किसी को धोखा देता है और न ही किसी से ईर्ष्या करता है। उसका मन एक साफ आईने की तरह है जिसमें कोई मैल (कपट) नहीं है।
दूसरी तरफ, आपका मन हमेशा हिसाब-किताब, छल-कपट और दिखावे के बोझ तले दबा रहता है। जब तक आप अपने मन से इन जटिलताओं और कपट को निकालकर इसे सरल और साफ नहीं करेंगे, तब तक मखमली गद्दे भी आपको शांति नहीं दे सकते।”
सेठ की आँखें खुल गईं। उन्होंने समझ लिया कि सच्ची शांति बाहर की दौलत में नहीं, बल्कि मन की सरलता में है। उन्होंने उसी दिन से छल-कपट का व्यापार छोड़ दिया और एक सरल, ईमानदार जीवन जीने लगे। कुछ ही दिनों में उनकी खोई हुई नींद और सुख-शांति वापस लौट आई।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब हम झूठ या कपट का सहारा लेते हैं, तो उसे छिपाने के लिए मन को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। निष्कपट होने से मन हल्का और तनावमुक्त रहता है। जो इंसान सरल और साफ दिल का होता है, लोग उस पर भरोसा करते हैं और उससे प्रेम करते हैं।








