महाशिवरात्रि के दिन स्वामी दयानंद सरस्वती अपने माता-पिता के साथ मंदिर गए। शिव की पूजा हुई, सब लोग पूजा के बाद घर लौट गए, लेकिन दयानंद वहीं रुक गए। उनके भीतर परमात्मा को जानने की तीव्र लगन थी, इसलिए वे पूरी रात मंदिर में बैठे रहे। रात लगभग तीन बजे उन्होंने देखा कि शिव की मूर्ति पर एक चूहा घूम रहा है। तब उनके मन में प्रश्न उठा, यदि शिव भगवान हैं, तो वे इस चूहे को क्यों नहीं भगा पा रहे? उस समय दयानंद केवल चौदह-पंद्रह वर्ष के थे।
उसी क्षण उन्होंने कहा, यह केवल मूर्ति है, भगवान नहीं। वहीं से दयानंद सरस्वती शिव की खोज में निकल पड़े। उन्होंने कठोर तप किया, जंगलों में भटके, स्थान-स्थान पर साधना की और अंततः अपने भीतर ही शिव को प्रकट किया। तभी उनका नाम पड़ा ‘दयानंद सरस्वती’। ‘सरस्वती’ का अर्थ है ज्ञान की देवी। यही संदेश उन्होंने दिया कि अब समय है मूरत से सूरत की ओर बढ़ने का। बाहर चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, साधक को उनसे विचलित नहीं होना चाहिए।
दयानंद सरस्वती ने खुलकर कहा, मैंने शिव की मूर्ति पर चूहा देखा और समझ गया कि भगवान यहां नहीं हैं। इसलिए मैं खोज में निकला और वर्षों की तपस्या के बाद मैंने अपने भीतर ही शिव को पाया। अब मैं शिव के साथ चलता हूँ, शिव के साथ सोता हूँ और शिव के साथ ही भोजन करता हूँ। उनका संदेश स्पष्ट था, इस मनुष्य देह से परमात्मा तक पहुँचने के लिए जीवन की दिशा बदलनी पड़ेगी। जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो, उस रास्ते पर परमात्मा नहीं है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हमें यह आत्ममंथन करने का अवसर देती है कि हम परंपरा के अनुयायी हैं या सत्य के साधक। क्या हम केवल कर्मकांडों में उलझे हैं, या भीतर के शिव की खोज में आगे बढ़ रहे हैं? दयानंद का जीवन हमें यही चुनौती देता है कि मूरत से आगे बढ़कर सूरत को पहचानें, भय से ऊपर उठकर सत्य के पक्ष में खड़े हों और अपने भीतर उस परम चेतना को जगाएं जो हमें सच में मनुष्य बनाती है।








