प्राचीन समय की बात है, एक राजा ने एक भव्य मंदिर और धर्मशाला बनवाने का निश्चय किया। इस कार्य के लिए देश के सबसे कुशल मूर्तिकारों और शिल्पकारों को बुलाया गया। उनमें से तीन मित्र थे, जो एक ही चट्टान को काटने का काम कर रहे थे।
एक दिन एक ज्ञानी संत वहां से गुजरे। उन्होंने उन तीनों के पास जाकर उनके मन, वचन और कर्म का प्रभाव देखना चाहा।
संत ने पहले व्यक्ति से पूछा, “बेटा, तुम क्या कर रहे हो?”
वह व्यक्ति झुंझलाकर बोला, “दिखता नहीं? पत्थर तोड़ रहा हूँ। सुबह से शाम तक पसीना बहाता हूँ ताकि दो वक्त की रोटी कमा सकूँ। यह काम मेरे भाग्य में लिखा है, इसलिए करना पड़ रहा है।”
संत दूसरे व्यक्ति के पास गए और वही सवाल पूछा। उसने मुस्कुराकर कहा, “महाराज, मैं राजा के लिए मंदिर की दीवार बना रहा हूँ। इससे मुझे अच्छी पगार मिलती है और मेरा परिवार सुखी है।”
जब संत तीसरे व्यक्ति के पास पहुँचे, तो वह मग्न होकर पत्थर पर नक्काशी कर रहा था। पूछने पर उसने आँखें बंद कीं और भावुक होकर कहा, “महाराज! मेरा सौभाग्य है कि प्रभु ने मुझे अपने घर (मंदिर) की एक ईंट सजाने का अवसर दिया है। मैं पत्थर नहीं तोड़ रहा, मैं तो ईश्वर की मूरत को आकार दे रहा हूँ।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जैसे एक छोटा सा बीज विशाल बरगद का भाग्य अपने भीतर समेटे होता है, वैसे ही आपका आज का एक छोटा सा शुभ विचार, एक मधुर शब्द और एक नेक कार्य आपके आने वाले कल का स्वर्णिम भाग्य लिखता है। “जैसा आप आज बोएंगे, कल की फसल वैसी ही होगी।”








