स्वामी विवेकानंद के पास एक दिन एक युवक पहुंचा। उसके चेहरे पर बेचैनी साफ दिख रही थी। उसने कहा, “मैं कई साधु-संतों से मिला, मंदिरों में गया, आश्रमों में रहा, लेकिन मुझे वह नहीं मिला, जिसकी मुझे तलाश है।”
स्वामी जी ने शांत स्वर में पूछा, “तुम आखिर चाहते क्या हो?”
युवक बोला, “मैं शांति चाहता हूं। मैंने हनुमान जी की साधना की, ध्यान-योग किया, बड़े-बड़े शास्त्र पढ़े, खुद को एकांत में रखा, लेकिन मन की अशांति दूर नहीं हुई।”
स्वामी जी ने ध्यान से उसकी बात सुनी और मुस्कुराकर बोले, “तुम्हारा रास्ता गलत नहीं है, लेकिन अधूरा है। सबसे पहले अपने उस एकांत कमरे के दरवाजे खोल दो, जिसमें तुम खुद को बंद करके साधना करते हो। फिर अपने घर के दरवाजे भी खोलो और बाहर निकलो।”
युवक थोड़ा चौंका। स्वामी जी आगे बोले, “बाहर ऐसे बहुत लोग हैं जो दुखी हैं, बीमार हैं, गरीब हैं और असहाय हैं। उन्हें खोजो, उनकी मदद करो। यदि धन से मदद नहीं कर सकते, तो तन और मन से सेवा करो। किसी को ज्ञान दो, किसी को सहारा दो। एक महीने तक ऐसा करो और फिर मेरे पास आना।”
युवक ने स्वामी जी की बात मानी। वह रोज बाहर निकलने लगा। उसने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, बीमारों की मदद की, बुजुर्गों का सहारा बना। धीरे-धीरे उसका मन बदलने लगा। जहां पहले उसे खालीपन महसूस होता था, अब वहां संतोष और सुकून भरने लगा।
एक महीने बाद वह फिर स्वामी जी के पास पहुंचा। इस बार उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। उसने कहा, “स्वामी जी, मुझे शांति मिल गई। दूसरों की सेवा करते हुए जो संतोष मिला, वह किसी साधना में नहीं मिला था।”
स्वामी जी बोले, “अब तुम साधना भी करो, ध्यान भी करो और शास्त्र भी पढ़ो, लेकिन सेवा को कभी मत छोड़ो। मानव सेवा ही सच्ची साधना है।”
इस तरह युवक ने समझ लिया कि असली शांति बाहर की दुनिया से भागने में नहीं, बल्कि उसमें योगदान देने में है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हम अक्सर अपनी समस्याओं में इतने उलझ जाते हैं कि दूसरों के दुख-दर्द को भूल जाते हैं। जब आप दूसरों की मदद करते हैं, तो आपका दृष्टिकोण बदलता है और मन हल्का होता है।








