पुराने समय में एक गुरुकुल में कई शिष्य एक साथ रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। वह आश्रम बहुत बड़ा था और वहां शिष्यों को अनुशासन के साथ-साथ आपसी सहयोग की भावना भी सिखाई जाती थी। सभी शिष्यों के रहने के लिए अलग-अलग छोटी-छोटी कुटिया थीं, दिनभर वे एक साथ अध्ययन, सेवा और कार्यों में लगे रहते थे और रात में अपनी-अपनी कुटिया में आराम करते थे।
उसी गुरुकुल में एक शिष्य था, जो स्वभाव से बहुत सहयोगी और मिलनसार था। वह हमेशा दूसरों की मदद करता, हर काम में आगे रहता और सभी के साथ मिलकर काम करता था। उसकी इसी आदत के कारण सभी शिष्य उसे पसंद करते थे, लेकिन कुछ समय बाद अचानक उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा। वह धीरे-धीरे अकेले रहने लगा। पहले जो शिष्य हर समय दूसरों के साथ रहता था, अब वह अपनी कुटिया में ही सीमित रहने लगा। न वह पहले की तरह किसी से बातचीत करता, न ही किसी काम में शामिल होता।
यह बदलाव देखकर बाकी शिष्य चिंतित हो गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ ऐसा क्या हुआ है। सभी ने मिलकर यह बात अपने गुरु को बताई।
गुरु बहुत विद्वान थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन दिनों ठंड का समय था, एक ठंडी शाम को गुरु उस शिष्य की कुटिया की ओर चल दिए। मौसम ठंडा था और हवा भी चल रही थी। शिष्य ने अपनी कुटिया में कुछ लकड़ियां जलाकर आग जलाई हुई थी और उसी के पास बैठा था।
जब गुरु वहां पहुंचे, तो शिष्य ने विनम्रता से उनका अभिवादन किया, लेकिन वह पहले की तरह उत्साहित नहीं था। गुरु भी चुपचाप उसके पास बैठ गए। काफी देर तक दोनों मौन रहे।
फिर गुरु ने धीरे से आग में से एक जलती हुई लकड़ी उठाई और उसे आग से अलग रख दिया। शिष्य यह सब ध्यान से देख रहा था। थोड़ी ही देर में वह लकड़ी धीमी पड़ गई और बुझ गई।
इसके बाद गुरु ने वही बुझी हुई लकड़ी फिर से आग के बीच रख दी। कुछ ही समय में वह लकड़ी फिर से जलने लगी।
अब गुरु बिना कुछ कहे वहाँ से उठे और बाहर जाने लगे। शिष्य ने तुरंत समझ लिया कि गुरु क्या समझाना चाहते थे। उसने गुरु के चरण छुए और कहा, “गुरुदेव, मैं समझ गया। अकेलापन इंसान को बुझी हुई लकड़ी की तरह बना देता है और अच्छे लोगों संगति उसे फिर से प्रज्वलित कर देती है।”
उस दिन के बाद वह शिष्य फिर से सभी के साथ रहने लगा और पहले की तरह सक्रिय हो गया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, इंसान एक सामाजिक प्राणी है। अकेलापन लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। परिवार, मित्रों और समाज से जुड़ाव बनाए रखना मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।








