धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 887

एक बार एक बहुत ही प्रतापी राजा था। उसके पास धन, दौलत, वैभव—सब कुछ था, लेकिन उसके मन में शांति नहीं थी। वह हर समय चिंतित और परेशान रहता था। अंत में, शांति की तलाश में वह जंगल में रहने वाले एक पहुँचे हुए संत के पास गया।

राजा ने संत से कहा, “महाराज, मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मेरा मन अशांत रहता है। कृपया मुझे सुख और शांति का मार्ग बताएँ।”

संत मुस्कुराए और बोले, “राजन्, इसका उत्तर कल सुबह मिलेगा। अभी आप थक गए होंगे, विश्राम करें।”

अगली सुबह, संत राजा को एक ऊँचे पहाड़ की चोटी पर ले गए। वहाँ पहुँचकर संत ने राजा को एक भारी पत्थर उठाने के लिए कहा। राजा ने पत्थर उठा लिया।

कुछ देर बाद संत ने राजा से कुछ नहीं कहा और चलते रहे। राजा पत्थर लेकर पीछे-पीछे चलता रहा।

थोड़ी देर और बीतने पर राजा के हाथ में दर्द होने लगा। उसने संत से कहा, “महाराज, यह पत्थर बहुत भारी है, अब मेरा हाथ दुख रहा है।”

संत बोले, “थोड़ा और चलो, उत्तर बस मिलने ही वाला है।”

अंत में, जब राजा का दर्द असहनीय हो गया, तो उसने पत्थर नीचे फेंक दिया। पत्थर फेंकते ही राजा ने चैन की एक गहरी साँस ली और उसे बहुत सुकून महसूस हुआ।

तब संत ने कहा, “यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जब तक तुमने उस भारी पत्थर को पकड़े रखा, तुम दर्द और अशांति में थे। जैसे ही तुमने उसे छोड़ दिया, तुम्हें शांति मिल गई।”

हमारे जीवन में सुख-शांति न होने के मुख्य कारण वही “मानसिक पत्थर” हैं जिन्हें हम ढो रहे हैं।

पुरानी कड़वी यादें: हम अतीत के दुखों को पकड़कर बैठे रहते हैं, जो वर्तमान की शांति छीन लेते हैं।

अत्यधिक इच्छाएँ: जैसे-जैसे बोझ (इच्छाएँ) बढ़ता है, मानसिक शांति कम होती जाती है।

तुलना और ईर्ष्या: दूसरों की प्रगति देखकर खुद को छोटा समझना भी एक भारी बोझ है।

सुख-शांति के लिए क्या करें?
छोड़ना सीखें: उन बातों और यादों को जाने दें जो आपके नियंत्रण में नहीं हैं। क्षमा करना शांति की पहली सीढ़ी है।

संतोष: जो आपके पास है, उसके लिए ईश्वर या प्रकृति का आभार मानें। “सब्र” ही सुख की जड़ है।

वर्तमान में जिएं: भविष्य की चिंता और अतीत का पछतावा ही अशांति के जनक हैं। जो आज है, वही सत्य है।

सेवा और दान: जब हम दूसरों के जीवन में सुख लाते हैं, तो बदले में हमें जो सुकून मिलता है, वह अनमोल है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, शांति कहीं बाहर नहीं, आपके भीतर ही है। बस आपको उन व्यर्थ के बोझों को नीचे रखना होगा जिन्हें आप वर्षों से ढो रहे हैं।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

ओशो-संतो मगन भया मन मेरा

परमहंस स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—24

Jeewan Aadhar Editor Desk

ओशो : गहरा प्रेम करो

Jeewan Aadhar Editor Desk