बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में एक बहुत ही धनी व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान महल, नौकर-चाकर और अपार संपत्ति थी, लेकिन वह हमेशा बीमार और तनाव में रहता था। उसे न तो रात को नींद आती थी और न ही उसका मन किसी काम में लगता था।
एक दिन उसे पता चला कि नगर के बाहर जंगल में एक सिद्ध संत आए हैं, जो लोगों के दुखों का निवारण करते हैं। व्यापारी उनके पास पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाई।
व्यापारी ने कहा, “महाराज, मेरे पास सब कुछ है, लेकिन सुख नहीं है। मेरा शरीर हमेशा रोगों से घिरा रहता है। मैं बहुत दुखी हूँ, कृपया मुझे सुखी होने का मार्ग बताएं।”
संत मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, मैं तुम्हें सुखी बना सकता हूँ, लेकिन इसके लिए तुम्हें कल सुबह मेरे पास आना होगा।”
अगली सुबह जब व्यापारी पहुँचा, तो संत ने उसे एक ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने को कहा। व्यापारी मोटा था और उसे चलने की आदत नहीं थी। थोड़ी दूर चढ़ते ही उसकी सांस फूलने लगी और पसीने छूटने लगे।
जब वह थककर बैठ गया, तो संत ने उसके सामने एक स्वादिष्ट भोजन की थाली और सोने के सिक्कों की एक थैली रख दी। संत ने पूछा, “बताओ, इस समय तुम्हें इन सोने के सिक्कों की जरूरत है या सादे ठंडे पानी की?”
व्यापारी ने बिना सोचे कहा, “महाराज, इस समय मुझे इन सिक्कों से कोई लेना-देना नहीं है, बस एक घूँट पानी मिल जाए तो मेरी जान बच जाए।”
संत ने मुस्कुराते हुए उसे पानी पिलाया और कहा— “यही तुम्हारे जीवन का सच है। जब तक तुम्हारा शरीर स्वस्थ है, तब तक तुम इन सुखों का आनंद ले सकते हो। लेकिन यदि शरीर ही साथ न दे, तो सोने के सिक्के भी पत्थर के समान हैं।”
संत ने उसे चार मूल मंत्र दिए:
परिश्रम: शरीर को आलस्य से बचाओ और मेहनत करो।
संयम: भोजन और विचारों पर नियंत्रण रखो।
संतोष: जो है उसमें खुश रहना सीखो।
योग और ध्यान: मन और आत्मा की शांति के लिए समय निकालो।
व्यापारी समझ गया कि उसने धन कमाने के चक्कर में अपने सबसे बड़े उपहार—स्वास्थ्य—को खो दिया था। उसने उसी दिन से अपनी जीवनशैली बदली और जल्द ही वह एक निरोगी और सुखी जीवन जीने लगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, संस्कृत में एक कहावत है— “पहला सुख निरोगी काया”। यदि आप स्वस्थ हैं, तो आप दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।








