धर्म

ओशो : पुण्य क्या है

मनुष्य की देह मिली और पुण्य का तुम्हें स्वाद नहीं है। तुमने जाना ही नहीं कि पुण्य क्या है। पाप ही जाना, बुराई ही जानी, भलाई का तुम्हें कोई अनुभव नहीं। तुम कहोगे: नहीं, ऐसा नहीं। कुछ-कुछ कभी-कभी भला भी करते हैं। राह पर भिखमंगे को कभी कुछ दो पैसे भी दे देते हैं। ओर कभी मंदिर में दान भी करते हैं। और कभी व्रत-उपवास भी करते हैं।जीवन आधार प्रतियोगिता में भाग ले और जीते नकद उपहार
लेकिन फिर भी मैं तुमसे कहता हूं कि धनी धरमदास ठीक कह रहे हैं:तुमने पुण्य नहीं जाना। राह पर तुम जब भिखारी को दो पैसे भी देते हो तब भी तुम्हें देने में आनन्द नहीं है। तुम भिखारी को सम्मान से भी नहीं देते हो। तुम भिखारी को राम मानकर भी नहीं देते हो। तुम्हारे देने के कारण कुछ औंर हैं, हेतु कुछ औंर है। देखते हो, अगर भिखारी रास्ते भर पर अकेला मिल जाये और कोई न हो रास्ते पर, तो तुम नहीं देते। बीच बाजार में भिखारी पकड़ लेता है। इसलिये भिखारियों को बाजार में खड़े रहना पड़ता है। एकान्त में तो तुम उनको दुत्कार देते हो कि चल आगे बढ़। भाग यहा से। भला-चंगा शरीर, तुझे क्या करना है मांग कर? हजार उपदेश दे देते हो। नौकरी की तलाश है..तो यहां क्लिक करे।
लेकिन भीड़ में, बाजार में , दुकानदार जहां सब देख रहे हैं जहा तुम्हारी प्रतिष्ठा का सवाल है, एक भिखारी आकर तुम्हारी पैर पकड़ लेता है, भला आदमी है। इसके लाभ हैं। यह तुम सच पूछो तो धंधा ही कर रहे हो। कुछ फर्क नहीं है इसमें। लोग देख रहे हैं कि आदमी देने वाला है, क्योंकि लोग तुम पर ज्यादा भरोसा करेंगे। लोग तुम्हें भला समझेंगे तो भरोसा करेंगे। ये तुमने दो पैसे दिये नहीं, धंधे में लगाये हैं। यह इनवेस्टमेंअ है। अकेले में तो तुम उसे हटाते हो, भिंखमंगे को। ये तुमने भिखमंगे को दिये ही नहीं। ये तुमने दूकान में ही लगाये । यह दूकान का ही फैलाव है। यह अच्छा विज्ञापन हुआ- दो पैसे में धार्मिक, दयालु, पुण्यात्मा होने की खबर पहुंच गयी गांव में। या अगर तुम कभी भिखारी को देते भी हो तो इस आशा में कि स्वर्ग मिलेगा।
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