धर्म

परमहंस स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से -83

विनाशकाले विपरीत बुद्धि: के अनुसार यदुवंशियों को कुछ समझ में नहीं आया। एक बार सन्तों का आगमन हुआ। आदर सत्कार करना तो दूर,शराब के नशे में धुत्त बने सन्तों से मजाक करने लगे। एक सांब नामक युवक को नारी का वेश पहनाया और सन्तों के पास उसको ने जाकर उनसे पूछा,महाराज आप त्रिकालदर्शी हैं। कृपया बताने का कृष्ट करें कि इस गर्भवती नारी का पुत्र होगा या पुत्री? सन्तों ने परमात्मा कृपा से सब जान लिया और कहा दुष्टों जिस कुल में बलराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरूष हुए,अब उसी कुल में तुम जैसे पापी उत्पन्न हो गए,जाओ, सांब के गर्भ से मूसल उत्पन्न होगा जो तुम्हारे समग्र यदुवंश का नाश करेगा।

अब यादवकुमार भयभीत हो गए। उन्होंने उस मूसल का रजकण बनाकर समुद्र के किनारे फैंक दिया और एक टुकड़ा बचा था, उसको भी वहीं फैंक दिया। उन रजकणों से घास उत्पन्न हुआ और उन्हीं से यादव आपस में लडक़र समाप्त हो गए और श्रीकृष्ण ने घोषणा की कि आज से सातवें दिन द्वारिकापुरी पानी में विलीन हो जायेगी।

परमात्मा ने सोचा कि यादव कुमार भविष्य में जनता को तंग करेंगे,अत: यह सोचकर उनको समाप्त कर दिया। वह मूसल उन सब का काल ही तो था,अत: कभी भी ऋषियों और सन्तों का अपमान मत करो। परमात्मा अपना अपमान सहन कर लेते हैं,परन्तु अपने भक्तों का अपमान कभी सहन नहीं करते।

भक्त प्रेमी आत्माओं। यदि अपना कल्याण करना चाहते हो तो साधुओं की शरण में चले जाओ और अधिक से अधिक समय उसकी सेवा में,सुमिरण में तथा उनके चरणों में व्यतीत करों।

एक घंटा नहीं तो आधा सही,यदि आधा घंटा आप सन्त शरण में नहीं बिता सकते तो 15 मिनट भी पर्याप्त हैं, यदि 15 मिनट ही साधु जनों की संगत मं आप व्यतीत करो तो आपके जन्म जन्मान्तरों के पाप नष्ट हो जायेंगे। आधे क्षण का सत्संग भी मनुष्य के लिए परम निधि बन जाता है।

परमात्मा में आसक्त सन्तों का क्षण का संग भी स्वर्ग और मोक्ष की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं, तो अन्य पदार्थो की चर्चा ही क्या?

इसीलिए यदि काल से बचना है तो परमात्मा के प्रतीक सन्तजनों की शरण में रहकर हर कार्य प्रभु की ओर उन्मुख रहकर करो,ऐसा करने से सभी क्रियाएँ भक्ति बन जायेंगी। आत्मा परमात्मा से बिछुड़ी हुई हैं, यह वियोग ही दु:ख का कारण हैं? इस दु:ख को मिटाने का उपाय क्या हैं? सर्वप्रथम तो यह दृढ़ निश्चय करो कि हमें परमात्मा से मिलना है। यह शरीर तो मलिन है इसके द्वारा ब्रह्म-सम्बंध नहीं हो पायेगा,अत: मन को परमात्मा से जोड़ लो,उसको अपना बना लो,एक दिन वे भी तुम्हें अपना बना लेंगे और भव सागर के पार हो जाओगे।

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