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सत्यार्थप्रकाश के अंश—26

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जब राजा शत्रुओं के साथ युद्ध करने को जाने तब अपने राज्य की रक्षा का प्रबन्धन और यात्रा की सब साम्रगी यथाविधि करके सब सेना,यान,वाहन शस्त्रास्त्रादि पूर्ण लेकर सर्वत्र दूतों अर्थात् चारों ओर के समाचारों को देने वाले पुरूषों को गुप्त स्थापन करके शत्रुओं की ओर युद्ध करने को जावे।
तीन प्रकार के मार्ग अर्थात् एक स्थल में,दूसरा जल में,तीसरा आकाशमार्गो को युद्ध बनाकर भूमिमार्ग में रथ, अश्व,हाथी जल में नौका और आकाश में विमानादि यानों से जावे और पैदल,रथ,हाथी,घोड़े शस्त्र,और अस्त्र खानापानादि साम्रगी को यथावत् साथ ले बलयुक्त पूर्ण करके किसी निमित्त को प्रसिद्ध करके शत्रु के नगर के समीप धीरे-धीरे जावे।
जो भीतर से शत्रु से मिला हो और अपने साथ भी ऊपर से मित्रता रखे,गुप्तता से ,शत्रु को भेद देवे,उस के आने जाने में उस से बात करने में अत्यन्त सावधानी रखे,क्योंकि भीतर शत्रु ऊपर मित्र पुरूष को बड़ा शत्रु समझना चाहिये।
सब राजपुरूषों को युद्ध करने की विद्या सिखावे और आप सीखे तथा अन्य प्रजाजनों को सिखावे जो पूर्व शिक्षित योद्धा होते हैं वे ही अच्छे प्रकार लड़ लड़ा जानते हैं। जब शिक्षा करे तब दण्डा के समान सेना की चलावे जैसा शकट अर्थात् गाड़ी के समान जैसे सुअर एक दूसरे के पीछे दौड़ते जाते हैं वैसे सेना को बनावे जैसे सूई का अग्रभाग सूक्ष्म पश्चात् स्थूल और उस से सूत्र स्थूल होता हैं वैस्ी शिक्षा से सेना को बनावे और जैसे ऊपर नीचे झपट मारता है इस प्रकार सेना को बनाकर लड़ावे।
जिधर भय विदित हो उसी ओर सेना को फैलावे,सब सेना के पतियों को चारों ओर रख के अर्थात् पह्माकार चारों ओर से सेनाओं को रखके मध्य में आप रहे।।
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