धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—302

गुरुकुल में एक शिष्य बहुत उदास रहता था। उसके गुरु उसे रोज देखते, लेकिन सोचते कि कुछ दिनों में इसका मन ठीक हो जाएगा। काफी दिन बीत जाने के बाद भी शिष्य आश्रम में दुखी ही रहता था। एक दिन गुरु ने उससे कहा कि आज शाम को तुम मेरे पास आना, मुझे कुछ बात करनी है।

शाम को पढ़ाई पूरी होने के बाद शिष्य गुरु के पास पहुंचा तो गुरु ने उससे कहा कि तुम इतना उदास क्यों रहते हो?

शिष्य बोला, ‘गुरुजी बीते समय में मेरे परिवार में बहुत परेशानियां एक साथ आ गई थीं। पुरानी बातों को याद करके मेरा पूरा परिवार बहुत दुखी रहने लगा है। उन्हें याद करके मैं यहां दुखी रहता हूं। मेरा मन पढ़ाई में भी नहीं लग पाता है।’

गुरु ने कहा, ‘क्या तुम नींबू शरबत पियोगे? उससे तुम्हें अच्छा महसूस होगा।’

शरबत के लिए शिष्य मान गया। गुरु ने नींबू शरबत बनाया और जानबूझकर उसमें नमक ज्यादा डाल दिया।

शिष्य ने जैसे ही थोड़ा सा शरबत पिया तो ज्यादा नमक की वजह से उसका मुंह बिगड़ गया। उसने गुरु से कहा, ‘गुरुजी इसमें नमक बहुत ज्यादा हो गया है।’

गुरु बोले, ‘अच्छा, शायद गलती से ज्यादा नमक डल गया है। मैं इसे फेंक देता हूं। फिर दूसरा शरबत बना लेते हैं।’

शिष्य बोला, ‘गुरुजी इसे फेंकने की जरूरत नहीं है, इसमें थोड़ी शकर डाल देंगे तो मिठास से शरबत का खारापन कम हो जाएगा और हम इसे पी सकेंगे।’

गुरु बोले, ‘बिल्कुल सही बात है। ठीक इसी तरह जब हमारे जीवन में बुरा समय आता है तो हमें भी दुख देने वाली बातों को भूलकर जीवन के अच्छे अनुभवों पर ध्यान लगाना चाहिए। ऐसा करने से बुरे समय में भी हमारी सोच सकारात्मक रहती है। अगर हम बीते समय की दुख देने वाली बातों पर ही टिके रहेंगे तो जीवन का दुख कभी खत्म ही नहीं हो पाएगा। इसीलिए सिर्फ अच्छी बातों पर ध्यान लगाना चाहिए।’

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