धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—394

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधू की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया। साधु ने आनंद के लिए प्रार्थना की – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।”

साधु की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।” साधु आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया। दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है। साधु आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधु का स्वागत किया। झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधु की आँखों में आँसू थे। साधु कहने लगा – “हे भगवान्! ये तूने क्या किया?”

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “महाराज आप क्यों दु:खी हो रहे हैं? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो! यह भी नहीं रहने वाला।” साधु मन ही मन सोचने लगा – “मैं तो केवल भेष से साधु हूँ। सच्चा साधु तो तू ही है, आनंद।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समय कभी ठहरता नहीं है। यह निरंतर चलता रहता है। आज सुख है तो कल दुख भी आयेंगे और दुख के बाद फिर सुख आयेंगे। इसलिए समय चाहें ​कैसा भी हो, हर पल परमपिता परमात्मा को याद करने से ही सुख—दुख का कभी अनुभव नहीं होगा। जाहें विद राखे प्रभु वाहीं विद रहिए..हरे कृष्णा..हरे कृष्णा.. हरे कृष्णा कहिए।

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