धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 568

वाल्मीकि रामायण का प्रसंग है। जब हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो उन्होंने हर जगह देख ली, लेकिन सीता कहीं नहीं दिखीं। लंका का हर घर, हर महल देख लिया। जब सीता नहीं मिलीं तो वे निराश हो गए। उन्होंने मन ही मन सोचा कि अगर खाली हाथ लौटा तो सारे वानरों को मृत्युदंड मिलेगा। मेरी असफलता का दंड खोज में निकले सारे वानरों को भोगना पड़ेगा। इससे अच्छा है मैं यहां आत्महाद कर लूं। मैं समुद्र के उस पार लौटूंगा ही नहीं, तो जामवंत, अंगद सहित बाकी लोग इंतजार करते रहेंगे और उनके प्राण बच जाएंगे।

हनुमान जी ने मन में आत्मदाह का निश्चय कर लिया। तभी उन्होंने कुछ देर रुककर शांत रहकर प्रभू श्रीराम का ध्यान लगाया। इससे उनके मन की बेचैनी खत्म हुई। उन्होंने फिर शांत चित्त से विचार किया कि आत्मदाह करने से पहले एक बार फिर लंका के उन स्थानों को देख लूं जहां अभी तक नहीं गया। एक आखिरी प्रयास कर लेता हूं। इसी आखिरी प्रयास के तहत वे अशोक वाटिका पहुंचे और वहीं उन्हें सीता जी मिल गईं।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हनुमान जी की यह लीला कोई सधारण लीला नहीं है। उन्होंने विश्व की मनुष्य जाति को इस लीला के माध्यम से संदेश दिया कि कभी हार मत मानों। जब लगे कि सभी प्रयास असफल हो रहे हैं तो एक अंतिम प्रयास भी करके देखना चाहिए। हनुमान जी ने इस लीला में ध्यान के महत्व को भी दिखाया। जब चित्त विचलित हो तो शांत होकर एकांत में ध्यान करें और अपने अराध्य देव से सहायता मांगे। ऐसे में चित्त विचलन की स्थिती से बाहर निकल आयेगा और समस्या का स्टीक हल आपको मिल जायेगा।

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