एक छोटे से गाँव में मोहन नाम का युवक रहता था। मेहनती था, पर ज़िंदगी में हर कदम पर उसे कोई-न-कोई बाधा मिल जाती थी। कभी काम बिगड़ जाता, कभी पैसा अटक जाता, तो कभी लोग उसका मनोबल तोड़ देते। मोहन बार-बार यही सोचता— “मेरे साथ ही क्यों समस्याएँ आती हैं?”
एक दिन गाँव में एक वृद्ध संत आए। मोहन ने अपनी सारी परेशानी उन्हें सुनाई। संत मुस्कुराए और बोले— “मैं तुम्हें एक कार्य देता हूँ। इस कागज़ पर दो बातें लिखकर लाओ—
पहली: तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या।
दूसरी: उस समस्या में छिपा अवसर।”
मोहन ने सोचा— समस्या लिखना आसान है, पर समस्या में अवसर कहाँ? फिर भी वह कोशिश करने लगा।
पहली समस्या लिखी— “मेरे पास पूँजी नहीं है।”
वृद्ध संत ने पूछा— “और इसमें अवसर?”
सोचते-सोचते मोहन ने लिखा— “पूँजी न होने से मैं कर्ज़ नहीं चढ़ा। मैं छोटे काम से शुरुआत कर सकता हूँ, जोखिम कम है।”
फिर दूसरी समस्या लिखी— “लोग मेरा साथ नहीं देते।”
इसमें अवसर लिखा— “मैं दूसरों पर निर्भर नहीं रहूँगा, खुद अपनी ताकत बढ़ाऊँगा।”
जब मोहन ने हर समस्या में अवसर ढूँढना शुरू किया तो चमत्कार होने लगे। जहाँ पहले दीवारें दिखती थीं, अब रास्ते दिखने लगे। जहाँ पहले डर था, अब सीख दिखाई देने लगी।
जहाँ पहले रुकावटें थीं, अब नए शुरूआत के द्वार खुलने लगे।
संत ने मुस्कुराकर कहा— “हर समस्या अपने साथ समाधान भी लाती है, बस देखने की नज़र चाहिए। समस्या दीवार नहीं, दिशा बदलने का संकेत होती है।”
उस दिन के बाद मोहन की सोच बदल गई। और सोच बदलते ही ज़िंदगी भी बदल गई।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समस्याएँ रुकावट नहीं, समझ और सफलता की सीढ़ियाँ हैं। जो देखने की नजर रखता है, वही आगे बढ़ता है।








