एक बार हिमालय की गहरी घाटियों में स्थित एक आश्रम में संत वत्सल रहा करते थे। उनके पास दूर-दूर से साधक सीखने आते थे। एक दिन एक युवा शिष्य, नयन, संत के पास आया और बोला— “गुरुदेव, मैं लक्ष्य बड़ा रखना चाहता हूँ, लेकिन रास्ते में आलस, डर और लोगों की बातों से कमजोर पड़ जाता हूँ। मुझे बताइए—सफलता कैसे मिले?”
संत वत्सल ने मुस्कराकर कहा— “आओ, आज मैं तुम्हें एक अनुभव कराता हूँ।”
संत नयन को लेकर जंगल में गए। वहाँ एक छोटा-सा दीपक जल रहा था। हवा तेज थी, पर दीपक बुझ नहीं रहा था।
नयन ने पूछा— “गुरुदेव, यह कैसे संभव है?”
संत बोले— “क्योंकि इसे बचाने वाले का ध्यान पूरी तरह इसी पर है।
लक्ष्य भी दीपक जैसा होता है— अगर बचाने वाले का ध्यान बिखर गया, तो वह बुझ जाता है।”
कुछ दूर चलकर संत उसे एक तेज बहती नदी के किनारे ले गए।
संत ने कहा— “इस नदी को पार करना है, पर बिना जोश के पार नहीं कर पाओगे।”
नयन ने कोशिश की, पर पानी का दबाव इतना था कि वह वापस आ गया।
संत हँसे और बोले— “यदि लक्ष्य पार करना है,तो शरीर नहीं—जुनून को आगे करो।”
नयन ने आँखें बंद कीं, गहरी सांस ली और पूरी शक्ति से तैरकर नदी पार कर गया।
नयन समझ चुका था— जिसमें आग हो, वही प्रवाह को चीर सकता है।
अंत में संत ने उसे ऊँची चट्टान पर खड़ा किया और बोले— “दुनिया कहेगी तू नहीं कर सकता।
थकान कहेगी रुक जा। डर कहेगा सम्भल कर चल। लेकिन बेटे… जो लक्ष्य के लिए जोशीला और जुनूनी होता है,वह किसी आवाज़ को नहीं— सिर्फ अपने लक्ष्य की पुकार को सुनता है।”
नयन की आँखों में चमक आ गई।
संत ने उसका हाथ पकड़कर कहा— “सफलता भाग्य से नहीं, तप, जोश और जुनून की आग से जन्म लेती है।”
उस दिन के बाद नयन ने अपने लक्ष्य को साधने में इतना समर्पण और जुनून लगाया कि कुछ ही समय में वह आश्रम का सबसे श्रेष्ठ साधक बन गया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अपने लक्ष्य के लिए जोशीले और जुनूनी बनिए। जुनून वह शक्ति है जो मन को ऊपर उठाती है, और जो ऊपर उठता है— वही ऊँचाई छूता है।








