धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—746

एक बार एक शिष्य अपने गुरु के पास आया और बोला— “गुरुदेव, मैं लोगों से बहुत उम्मीदें रखता हूँ। कभी कोई मेरी सहायता नहीं करता, कभी कोई मेरा साथ नहीं देता। इससे मेरा मन दुखी रहता है। मैं क्या करूँ?”

गुरु मुस्कुराए, शिष्य का हाथ पकड़कर उसे आश्रम के बगीचे में ले गए। वहाँ एक आम का पेड़ था—शांत, स्थिर और सदा फल देने वाला।

गुरु ने कहा— “देखो इस पेड़ को…यह किसी से पानी मांगता है? किसी से धूप या हवा की उम्मीद करता है?
नहीं।
यह बस अपना कर्तव्य निभाता है— जड़ें मजबूत रखता है, बढ़ता है, और फल देता है।”

शिष्य बोला— “लेकिन गुरुदेव, लोग तो पेड़ को पत्थर मारकर ही फल तोड़ते हैं!”

गुरु बोले— “हाँ, यही तो जीवन का सत्य है। पेड़ फिर भी फल देना नहीं छोड़ता। क्योंकि उसे पता है— उसकी शक्ति ‘उम्मीद’ में नहीं, उसके ‘स्वभाव’ में है।’जब तुम अपने स्वभाव से काम करोगे, बिना किसी अपेक्षा के, तो तुम्हारा मन कभी दुखी नहीं होगा।”

फिर गुरु ने समझाया— “किसी से उम्मीद मत रखो। जो अच्छा करो, अपने कर्तव्य और अपने दिल से करो। जो लौटकर आए, उसे आशीर्वाद समझो, और जो वापस न आए, उसे अनुभव।”

शिष्य के भीतर जैसे प्रकाश फैल गया। उसने सिर झुकाकर कहा— “गुरुदेव, अब मैं समझ गया…
उम्मीदें बांधती हैं, और निःस्वार्थ कर्म मुक्त करते हैं।”

गुरु मुस्कुराए— “जब तुम लोगों से उम्मीद छोड़ देते हो, तब तुम खुद से उम्मीद करना शुरू कर देते हो— और यही आत्मबल का उदय है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, किसी से उम्मीद मत रखो, अच्छा करो, अच्छा सोचो, और अपने कर्मों पर भरोसा रखो। क्योंकि उम्मीदें टूटती हैं, पर कर्म कभी धोखा नहीं देते।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 417

ओशो : ध्यान

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—702