एक नगर में एक प्रसिद्ध कुम्हार रहता था। उसके बनाए बर्तन सुंदर होते थे, लेकिन उसका जीवन अव्यवस्थित था। कभी अत्यधिक काम करता, तो कभी बिल्कुल ही आलसी हो जाता। कभी बहुत बोलता, तो कभी व्यर्थ क्रोध कर बैठता। वह संतुलन चाहता था, पर समझ नहीं पाता था कि गलती कहाँ है।
एक दिन वह एक संत के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, मैं मेहनत करता हूँ, फिर भी मन अशांत रहता है। मेरे स्वभाव के दोष मेरा पीछा नहीं छोड़ते।”
संत ने उसे अपनी कुटिया में ले जाकर एक धूल से भरा दर्पण दिखाया और एक छोटा सा दीपक जलाया।
उन्होंने पूछा, “इस दर्पण में तुम्हें क्या दिखता है?”
कुम्हार बोला, “कुछ भी साफ़ नहीं, दर्पण गंदा है।”
संत ने कहा, “यह दर्पण तुम्हारा मन है। और यह दीपक आत्म-निरीक्षण।”
फिर संत ने धीरे-धीरे दर्पण को साफ़ किया। जैसे-जैसे धूल हटती गई, चेहरा स्पष्ट दिखाई देने लगा।
संत बोले, “जब हम अपने भीतर झाँकने का दीपक जलाते हैं, तब दोष छिप नहीं पाते।
लेकिन दीपक जलाने का साहस सबमें नहीं होता।”
कुम्हार ने पूछा, “मैं यह साहस कैसे लाऊँ?”
संत ने उत्तर दिया, “हर रात सोने से पहले तीन प्रश्न स्वयं से पूछो— आज मैंने कहाँ संतुलन खोया? आज मैंने कहाँ स्वयं पर नियंत्रण रखा? कल मैं क्या बेहतर कर सकता हूँ?”
कुम्हार ने संत की बात मानी। कुछ महीनों में उसका स्वभाव बदल गया। काम में भी संतुलन आया और मन में भी शांति।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, आत्म-निरीक्षण वह दीपक है, जो हमारे भीतर के अंधकार को दूर करता है। दोषों को देखने से नहीं, उन्हें स्वीकार कर सुधारने से जीवन में संतुलन आता है।








