धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—775

एक बार की बात है। एक संत एक गाँव में ठहरे हुए थे। गाँव के लोग रोज़ मंदिर की सफ़ाई करते, दीप जलाते, फूल चढ़ाते और बड़े नियम से पूजा करते थे। संत यह सब देख मुस्कराते रहते।

एक दिन संत ने गाँव वालों से पूछा— “तुम लोग मंदिर की इतनी सेवा करते हो, अच्छा है। पर क्या तुम अपने शरीर की भी उतनी ही सेवा करते हो?” लोग चौंक गए। किसी ने कहा, “महाराज, शरीर तो नश्वर है, इसे क्या सँभालना।”

संत ने पास पड़े एक टूटे हुए दीये की ओर इशारा किया और बोले— “अगर दीया फूटा हो, उसमें तेल न हो, बाती गीली हो—तो क्या उसमें दीपक जलेगा?”
लोग बोले, “नहीं महाराज।”

संत ने शांत स्वर में कहा— “यही शरीर वह दीया है। इसमें आत्मा का प्रकाश जलता है। अगर शरीर को गंदगी, आलस्य, नशे, असंयम और अव्यवस्था से भर दोगे, तो साधना, सेवा और कर्म का प्रकाश कैसे जलेगा?”

एक किसान था। उसके पास मजबूत बैल था। किसान रोज़ बैल से खूब काम लेता, पर उसे समय पर चारा नहीं देता, पानी नहीं पिलाता और आराम भी नहीं देता। कुछ समय बाद बैल कमजोर पड़ गया और खेत जोतने लायक नहीं रहा। तब किसान को समझ आया कि मेहनत लेने से पहले देखभाल ज़रूरी है।

संत बोले— “तुम्हारा शरीर भी वही बैल है। इससे जीवन की खेती करनी है—कर्म की, सेवा की, साधना की। अगर समय पर भोजन, शुद्ध विचार, नियमित श्रम, विश्राम और संयम नहीं दोगे, तो शरीर जवाब दे देगा।”

फिर संत ने अंतिम उपदेश दिया— “मंदिर में जूते पहनकर नहीं जाते, उसी तरह शरीर-मंदिर में क्रोध, लोभ, नशा, आलस्य और गलत आदतें मत लाओ। शुद्ध आहार, सही विचार, संयमित जीवन और नियमित परिश्रम—यही शरीर की पूजा है।”

उस दिन से गाँव वालों ने केवल पत्थर के मंदिर की ही नहीं, अपने शरीर-मंदिर की भी देखभाल शुरू कर दी। और सच में—उनकी कार्यशक्ति, स्वास्थ्य और मन की शांति तीनों बढ़ गईं।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हमारा शरीर एक मंदिर है। इसका ध्यान रखेंगे, तो यही शरीर जीवन के हर अच्छे काम में हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाएगा।

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