एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में रामदास नाम का युवक रहता था। उसके मन में एक बड़ा सपना था—वो अपने गाँव के लिए एक सुंदर पानी का कुआँ बनाना चाहता था, जिससे हर घर तक पानी पहुँचे।
रामदास ने मेहनत शुरू की। दिन-रात काम करता, पत्थर उठाता, मिट्टी खोदता, और लोगों को इस काम में साथ जोड़ने की कोशिश करता। लेकिन रास्ता आसान नहीं था।
पहले दिन ही उसके हाथ कांटों से कट गए। अगले ही दिन गाँव के कुछ लोग उसे हँसने लगे और कहा, “ये काम तुम्हारे बस का नहीं है, छोड़ दो।”
रामदास ने देखा कि रास्ते में कांटे भी चुभेंगे, पत्थर भी लगेंगे। उसने अपने दिल से कहा, “ये तो रास्ते की परख है, मंजिल तो दूर नहीं।”
कुछ महीने बाद, उसे बड़े-बड़े पत्थर मिले जिन्हें हटाना मुश्किल था। थकावट और हताशा उसे घेरने लगी। उस समय गाँव के बुजुर्ग संत ने उसे देखा और बोले—
“बेटा, कांटे और पत्थर तुम्हें डराने नहीं आए हैं। ये सिर्फ यह देखने आए हैं कि तुम्हारा इरादा सच्चा है या नहीं। जब मन मजबूत होगा, तो यही कांटे और पत्थर तुम्हारी शक्ति बन जाएंगे।”
रामदास ने संत की बातें अपने दिल में बिठाई और फिर मेहनत जारी रखी। उसने धीरे-धीरे पत्थरों को हटाया, कांटों से हाथों को बचाते हुए काम किया। गाँव वाले भी उसकी लगन देखकर मदद करने लगे।
एक साल बाद, वह पानी का कुआँ बनकर तैयार हुआ। गाँव के लोग जो कल तक रामदास की हंसी उड़ाते थे आज उसी के कुएं का पानी पीकर खुश थे और रामदास की मेहनत की सराहना करते हुए नहीं थक रहे थे। उसने खुद महसूस किया—“सिर्फ मंजिल पाने वाला ही नहीं, रास्ते की मुश्किलें भी हमारी ताकत बढ़ाती हैं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, कांटे चुभेंगे, पत्थर लगेंगे—ये मंजिल के रास्ते हैं। मुश्किलें रोकने नहीं आतीं, बल्कि तुम्हें मजबूत बनाने आती हैं। जो लोग हार नहीं मानते, उनकी मेहनत और धैर्य से हर बाधा छोटी पड़ जाती है।








