घने जंगल के किनारे एक पुराना आश्रम था। उस शाम तेज़ बारिश हो रही थी। कुछ लोग भागते हुए आश्रम में आए— चेहरों पर डर, आँखों में थकान।
उन्होंने संत से कहा— “बाबा, हालात बहुत खराब हैं। अब तो सब छोड़ देने का मन करता है।”
संत ने आग जलाई, लकड़ियाँ चटकने लगीं। फिर वे धीरे से बोले— “जब आग तेज़ होती है, तभी सोना पहचाना जाता है।”
संत उन्हें आश्रम के कारीगर के पास ले गए। वहां एक बड़ा संगमरमर का पत्थर रखा था। हथौड़ा उठा—ठक! ठक! ठक!
पत्थर मानो चीख रहा हो। एक युवक बोला— “बाबा, यह तो टूट जाएगा!”
संत मुस्कराए— “नहीं बेटा, यह टूट नहीं रहा, यह भगवान बन रहा है।”
उन्होंने पास में पड़े दूसरे पत्थर की ओर इशारा किया— चिकना, सुरक्षित, बिना चोट।
“इसे कोई नहीं मारता, इसलिए इसे कल फर्श पर बिछा देंगे—जहाँ रोज़ हज़ारों पाँव पड़ेंगे।”
संत ने धीमे स्वर में कहा— “चोट से बचा पत्थर कुचल दिया जाता है, और चोट सहने वाला पूज्य बनता है।”
बारिश तेज़ हो गई। आश्रम के पीछे से नदी की आवाज़ आने लगी।
संत बोले— “देखो उस नदी को।” नदी चट्टान से टकराई, झाग उछले, आवाज़ हुई।
एक व्यक्ति बोला— “यह तो टूट जाएगी।”
संत हँसे— “नदी नहीं टूटती, वह रास्ता बनाती है।”
वर्षों बाद वही नदी—खेत सींचती है, नगर बसाती है,और समुद्र से मिलकर अमर हो जाती है।
संत ने आँखें बंद कीं और बोले— “मैं एक साधक को जानता था। लोग उसे पागल कहते थे।”
वह भूखा था, उसका मज़ाक उड़ाया गया, उसे तिरस्कृत किया गया।
लेकिन वह नहीं टूटा। वह रोज़ खुद से कहता— ‘आज सह लूँगा, कल रोशनी बनेगी।’
समय बदला। आज लोग उसी के चरणों में बैठकर अपने जीवन का मार्ग पूछते हैं।
बारिश थम चुकी थी। लेकिन लोगों के भीतर कुछ जाग चुका था।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “जीवन तुम्हें कुचलने नहीं आया, वह तुम्हें तराशने आया है। अब तय तुम्हें करना है— भगवान बनना है या फर्श बनना है।”








