एक बार एक प्रसिद्ध संत नदी किनारे बैठे ध्यान कर रहे थे। उनके पास एक युवक आया। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएँ थीं। उसने संत को प्रणाम किया और बोला— “महात्मा जी, मेरा मन कभी शांत नहीं रहता। कभी बीते हुए कल का पछतावा, तो कभी आने वाले कल की चिंता—यही मेरा जीवन बन गया है।”
संत मुस्कराए। उन्होंने युवक को पास बैठाया और नदी की ओर इशारा करते हुए बोले, “इस नदी को देख रहे हो?”
युवक ने कहा, “हाँ, महाराज।”
संत बोले, “इस नदी का जो पानी बहकर निकल गया, क्या वह लौट सकता है?”
युवक बोला, “नहीं।”
“और जो पानी अभी आया ही नहीं, क्या उसे छू सकते हो?” संत ने पूछा।
“नहीं,” युवक ने सिर झुका लिया।
संत ने कहा, “तो फिर जो एकमात्र पानी तुम्हारे हाथ में है, वह कौन-सा है?”
युवक कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “जो इस समय बह रहा है… यही।”
संत ने गहरी बात कह दी— “बस यही वर्तमान है। जो लोग बीते हुए कल में उलझे रहते हैं, वे पछतावे में जीते हैं। जो आने वाले कल में खोए रहते हैं, वे भय में जीते हैं। और जो वर्तमान को जीते हैं, वही जीवन के वास्तविक आनंद को पहचानते हैं।”
इतना कहकर संत ने पास रखे दीपक को जलाया। उन्होंने कहा, “दीपक की रोशनी अभी है, न कल की, न कल आने वाली। अंधकार इसी क्षण मिटता है।”
युवक की आँखें भर आईं। उसे पहली बार समझ आया कि सुख कहीं बाहर नहीं, बल्कि इस क्षण को पूरी तरह जीने में है।
उस दिन के बाद युवक ने बीते कल को सीख और आने वाले कल को आशा बनाकर, आज को जीना सीख लिया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी,“जो वर्तमान में जीना सीख गया, उसने जीवन का अमृत पा लिया।”








