बहुत समय पहले की बात है। एक पहाड़ी इलाके में शिवदत्त नाम का एक युवक रहता था। वह पढ़ा–लिखा, तेज दिमाग वाला और मेहनती था। उसके मन में हमेशा कुछ बड़ा करने की इच्छा रहती थी। गाँव के साधारण काम उसे छोटे लगते थे। वह अक्सर कहा करता— “जो जोखिम नहीं लेता, वह आगे नहीं बढ़ता।”
उसी गाँव के बाहर एक आश्रम था। वहाँ एक वृद्ध संत रहते थे। लोग दूर–दूर से उनसे सलाह लेने आते, क्योंकि उन्होंने जीवन के उतार–चढ़ाव देखे थे। असफलता भी देखी थी और सफलता की ऊँचाइयाँ भी। पर शिवदत्त को लगता— “अनुभव पुराने लोगों का बोझ होता है, नई सोच ही दुनिया बदलती है।”
एक दिन शिवदत्त ने निश्चय किया कि वह पहाड़ काटकर एक नई सड़क बनवाएगा, जिससे व्यापार बढ़े और वह बड़ा ठेकेदार बन सके। उसने बिना किसी जानकार से पूछे, बिना ज़मीन की जाँच कराए, बिना मौसम और खर्च का सही अनुमान लगाए काम शुरू कर दिया। शुरुआत में सबको लगा—युवक में दम है।
लेकिन कुछ ही महीनों में समस्याएँ आने लगीं। बरसात आई तो पहाड़ धसकने लगे। मशीनें फँस गईं, मजदूर डर गए, खर्च दोगुना हो गया। धीरे–धीरे पैसा खत्म होने लगा और काम रुक गया। लोग वही कहने लगे जो पहले चुप थे—“अगर अनुभवी से पूछ लिया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता।”
टूटे मन से शिवदत्त एक दिन आश्रम पहुँचा। संत ध्यान में बैठे थे। उसने चरणों में बैठकर कहा— “बाबा, मैं हार गया। मेहनत की, साहस दिखाया, फिर भी सब गलत हो गया।”
संत ने आँखें खोलीं और शांत स्वर में बोले— “बेटा, साहस अच्छा है, पर साहस को दिशा चाहिए। तेज़ चलना तब ही लाभ देता है, जब रास्ता सही हो। और रास्ता वही बताता है, जिसने पहले ठोकरें खाई हों।”
संत उसे पहाड़ की ओर ले गए और एक पुरानी दरार दिखाकर बोले— “यह दरार देख रहे हो? इसे देखकर मैं बता सकता हूँ कि यहाँ बरसात में ज़मीन खिसकेगी। यह ज्ञान किताब से नहीं, वर्षों के अनुभव से आया है।”
फिर संत ने शिवदत्त को कुछ अनुभवी इंजीनियरों और पुराने ठेकेदारों से मिलवाया। इस बार उसने धैर्य से सब सीखा—जमीन की जाँच, मौसम का अनुमान, खर्च का संतुलन और सही समय पर काम रोकना भी।
काम दोबारा शुरू हुआ। धीरे–धीरे, सोच–समझकर। इस बार बरसात आई तो भी नुकसान नहीं हुआ। कुछ वर्षों में वही सड़क पूरी हुई और पूरे क्षेत्र का विकास हुआ। शिवदत्त को मान–सम्मान भी मिला और सफलता भी।
एक दिन उसने आश्रम में आकर संत से कहा— “बाबा, अगर पहली बार आपकी बात मान ली होती, तो बहुत कष्ट से बच जाता।”
संत मुस्कराए और बोले— “अनुभव से सीखना सबसे पक्का तरीका है, पर दूसरे के अनुभव से सीखना सबसे बुद्धिमानी का काम है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, बड़ा काम करने से पहले सलाह लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। अनुभव दीपक है, जो अँधेरे रास्ते को रोशन करता है। जो सुनना सीख लेता है, वही नेतृत्व करने योग्य बनता है।








