धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 784

रामायण में जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तब उनके सामने एक अत्यंत विचित्र और चुनौतीपूर्ण संसार था। लंका सोने की थी, भव्य थी, लेकिन वहां रावण जैसा अधर्मी रहता था। हर ओर भोग-विलास, नशा, अहंकार और अज्ञान का वातावरण था। हनुमान जी ने लंका के एक-एक महल में देवी सीता को खोजना शुरू किया। हर महल में उन्हें कई स्त्रियां दिखीं, लेकिन माता सीता कहीं दिखाई नहीं दीं।

हनुमान जी स्वयं माता सीता को कभी देख नहीं पाए थे, फिर भी उनके मन में माता की पवित्र छवि स्पष्ट थी। वे जानते थे कि इतनी अशुद्ध और विकृत जगह में देवी सीता नहीं हो सकतीं। खोज करते-करते वे एक विशाल महल में पहुंचे, जहां उन्होंने रावण को पहचान लिया। रावण मदहोशी में सो रहा था, उसके चारों ओर स्त्रियां भी थीं। हनुमान जी समझ गए कि यह निद्रा नहीं, अहंकार और अधर्म की बेहोशी है, लेकिन यहां भी माता सीता नहीं थीं।

इस बिंदु पर हनुमान जी के मन में निराशा ने जगह बना ली। उन्होंने सोचा कि अगर मैं माता सीता की सूचना के बिना लौट गया तो श्रीराम को क्या उत्तर दूंगा?

ये विचार उनके मन को व्यथित कर रहा था, लेकिन हनुमान जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने निश्चय किया कि बिना लक्ष्य पूरा किए लौटना नहीं है।

उन्होंने आंखें बंद कीं और मन ही मन श्रीराम से प्रार्थना की कि प्रभु, मुझे मार्ग दिखाइए। उसी क्षण उनकी दृष्टि एक ऐसे महल पर पड़ी जो बाकी सभी से भिन्न था। वहां न शोर था, न विलासिता। उस महल में एक छोटा-सा मंदिर था। ये देखकर हनुमान जी चकित रह गए। जो रावण संसार के मंदिरों को नष्ट करता है, उसी की लंका में मंदिर का होना आशा का संकेत था।

हनुमान जी समझ गए कि जहां भक्ति है, वहीं सत्य है। असफलता के बाद मंदिर दिखना आशा का एक दीपक था। ये जगह थी- विभीषण का महल। इसके बाद ही हनुमान जी अशोक वाटिका और माता सीता तक पहुंच गए।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में असफलता या थकान आना सामान्य है, लेकिन वहीं रुक जाना सबसे बड़ी गलती है। निराशा दूर करके पूरी ऊर्जा के साथ दूसरा प्रयास शुरू करना चाहिए।
कार्यस्थल या समाज में गलत माहौल होने पर अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। जीवन में भी अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, तो आकर्षण, बाधाएं और भ्रम हमें भटका नहीं सकते।

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Jeewan Aadhar Editor Desk

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