रमण महर्षि अरुणाचल पहाड़ी (तमिलनाडु) की एक गुफा में रहा करते थे। वहां के जंगलों में जहरीले सांप और जंगली जानवर आम थे। एक दिन की बात है, महर्षि अपनी गुफा के बाहर शांति से बैठे थे, तभी एक बहुत बड़ा और विषैला सांप (कोबरा) रेंगता हुआ उनके बिल्कुल करीब आ गया।
वहां मौजूद उनके कुछ शिष्य डर के मारे पीछे हट गए और पत्थर उठाने लगे ताकि सांप को भगा सकें या मार सकें। लेकिन महर्षि ने शांत भाव से हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया।
महर्षि हिले तक नहीं। उन्होंने उस सांप की आँखों में बड़े ही प्रेम और सम्मान से देखा, जैसे वह कोई रेंगने वाला जीव नहीं बल्कि साक्षात ईश्वर का रूप हो। उन्होंने सांप से धीरे से कहा, “तुम भी अपने घर जाना चाहते हो और मैं भी यहाँ शांति से रहना चाहता हूँ। तुम अपना रास्ता चुन लो, डरने की कोई बात नहीं है।”
आश्चर्य की बात यह हुई कि वह सांप, जो फुफकार रहा था, अचानक शांत हो गया। उसने अपना फन नीचे किया, महर्षि के चरणों के पास से धीरे से गुजरा और बिना किसी को नुकसान पहुँचाए झाड़ियों में चला गया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब हमारे भीतर किसी के लिए घृणा या डर नहीं होता, तो सामने वाला (चाहे वह इंसान हो या जानवर) भी अपनी रक्षात्मक आक्रामकता छोड़ देता है। आमतौर पर हम केवल अपनों या बड़ों को सम्मान देते हैं। लेकिन महर्षि ने एक ‘सांप’ को भी वही सम्मान और अस्तित्व का अधिकार दिया जो एक मनुष्य को मिलता है। जब आप सृष्टि के कण-कण को सम्मान देते हैं, तो पूरी सृष्टि आपकी रक्षा करने लगती है।








