बहुत समय पहले की बात है। एक निर्जन पहाड़ी क्षेत्र में एक प्राचीन आश्रम था। आश्रम छोटा था, पर वहाँ की शांति बहुत गहरी थी। उस आश्रम में एक संत रहते थे—सरल वस्त्र, शांत मुख और आँखों में अद्भुत तेज। आश्रम में धन–दौलत कुछ नहीं थी, पर लकड़ी की अलमारियों में सजी पुस्तकें किसी खजाने से कम नहीं थीं।
जो भी यात्री वहाँ आता, वह देखकर आश्चर्य करता— “महाराज, आप तो संसार त्याग चुके हैं, फिर इतनी पुस्तकें क्यों?”
संत बड़े प्रेम से उत्तर देते, “पुस्तकें संसार का बोझ नहीं होतीं, वे तो मन को मुक्त करती हैं। अध्ययन भी एक तप है, और हर तप से शक्ति जन्म लेती है।”
उसी क्षेत्र में एक युवक रहता था—नाम था माधव। वह बुद्धिमान था, पर मन से कमजोर। थोड़ी-सी असफलता उसे निराश कर देती। वह दिन-रात मेहनत करता, फिर भी उसे लगता कि उसका भाग्य साथ नहीं दे रहा। दूसरों को आगे बढ़ता देखकर उसके मन में ईर्ष्या और हताशा भर जाती।
एक दिन अत्यंत निराश होकर वह संत के पास पहुँचा। आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “महाराज, मैं मेहनत करता हूँ, पूजा करता हूँ, पर जीवन में स्थिरता नहीं आ रही। बताइए, मेरे भीतर कमी क्या है?”
संत ने ध्यान से उसकी ओर देखा और बिना कुछ कहे आश्रम के भीतर गए। थोड़ी देर बाद वे एक पुरानी, मोटी पुस्तक लेकर आए। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे, पर अक्षरों में तेज था।
संत ने पुस्तक माधव के हाथ में रखते हुए कहा, “इसका प्रतिदिन अध्ययन करो। एक अध्याय भी बहुत है, पर मन लगाकर पढ़ना। पढ़ते समय यही समझना कि यह शब्द नहीं, अनुभव हैं।”
माधव को विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा, मेरी समस्या इतनी बड़ी है और समाधान सिर्फ किताब? फिर भी संत की आँखों में जो दृढ़ विश्वास था, उसने उसे आज्ञा मानने को विवश कर दिया।
पहले कुछ दिन कठिन थे। मन भटकता, नींद आती, शब्द बोझ लगते। कई बार उसने पुस्तक बंद कर देने का मन बनाया। लेकिन संत के वाक्य उसके कानों में गूँजते— “तप में कष्ट आता ही है, पर उसी से शक्ति जन्म लेती है।”
धीरे-धीरे बदलाव शुरू हुआ। पुस्तक के विचार उसके मन में उतरने लगे। नकारात्मक सोच कम होने लगी। उसे समझ आने लगा कि असफलता अंत नहीं, सीख है। आत्मविश्वास बढ़ने लगा। उसका दृष्टिकोण बदल गया—अब वह परिस्थितियों को दोष नहीं देता, बल्कि स्वयं को सुधारने लगा।
कुछ महीनों बाद माधव पूरी तरह बदल चुका था। वही व्यक्ति जो छोटी बातों पर टूट जाता था, अब संकट में भी शांत रहता। उसकी वाणी में वजन आ गया था, उसके निर्णय स्पष्ट थे। लोग उसकी सलाह लेने आने लगे। जिस जीवन से वह भागना चाहता था, वही जीवन अब उसे अवसरों से भरा दिखाई देने लगा।
एक दिन वह कृतज्ञता से भरा हुआ संत के चरणों में बैठा और बोला, “महाराज, आपने मेरे भीतर नई शक्ति जगा दी। आपने मुझे दूसरा जन्म दिया है।”
संत मंद मुस्कान के साथ बोले, “न मैंने तुम्हें बदला, न मैंने तुम्हें शक्ति दी। यह सब पुस्तकों का प्रभाव है। पुस्तकों में सकारात्मक विचार, अनुभवों का ज्ञान और असीम शक्ति छिपी होती है। जब कोई व्यक्ति श्रद्धा, नियमितता और धैर्य से अध्ययन करता है, तो वही शक्ति उसके भीतर जाग जाती है।”
फिर संत ने अंतिम उपदेश दिया— “ध्यान आत्मा को शुद्ध करता है, और अध्ययन बुद्धि को प्रकाशित करता है। जो प्रतिदिन थोड़ा-सा भी पढ़ता है, वह अनजाने ही अपने जीवन की दिशा बदल देता है। इसलिए याद रखना—अध्ययन करना केवल आदत नहीं, यह जीवन बदलने वाली तपस्या है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जो व्यक्ति पुस्तकों से जुड़ता है, वह कभी अकेला नहीं रहता। अध्ययन से सोच बदलती है, सोच से जीवन बदलता है, और यही अध्ययन की सबसे बड़ी शक्ति है।








