एक शांत आश्रम में एक सिद्ध संत रहते थे। उनके चेहरे पर गहरी शांति थी, मानो समय भी उनके सामने ठहर जाता हो। एक दिन कुछ साधक उनके पास आए और बोले— “गुरुदेव, मन कभी रुकता ही नहीं। वह हर क्षण कुछ नया चाहता है—नया विचार, नया मार्ग, नई खोज। यह चंचलता साधना में बाधा क्यों बन जाती है?”
संत ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षण मौन रहे। फिर धीरे से बोले—“जिस आत्मा में चेतना है, वहाँ गति होना स्वाभाविक है। और जहाँ गति है, वहाँ नवीनता का जन्म होता है।”
परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 795
उन्होंने पास रखे कमल के फूल को उठाया और कहा— “कमल हर सुबह नया खिलता है, फिर भी उसकी सुगंध वही रहती है। नवीनता परिवर्तन है, पर सत्य शाश्वत है।”
संत आगे बोले— “मन का नया सोचना कोई दोष नहीं है। मन को नया न मिले, तो वह जड़ हो जाता है। पर जब मन स्वयं को कर्ता समझ लेता है, तब वही नवीनता अशांति बन जाती है।”
एक साधक ने पूछा— “तो फिर सही मार्ग क्या है, गुरुदेव?”
संत मुस्कराए— “जब नया विचार तुम्हें अहंकार से मुक्त करे,जब नई खोज तुम्हें करुणा की ओर ले जाए, और जब नया निर्माण तुम्हारे भीतर विनम्रता जगाए—समझ लेना कि वही साधना है।”
उन्होंने आकाश की ओर देखा और कहा—“सूर्य प्रतिदिन नया उगता है, पर उसका प्रकाश सबके लिए समान है। इसी प्रकार आत्मा भी हर क्षण नई होती है, यदि हम उसे पुराने भय और इच्छाओं से बाँधें नहीं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “नया सोचना मन का स्वभाव है, नया बनाना चेतना की शक्ति है,और नई खोज आत्मा की यात्रा है। पर जो सत्य तक ले जाए, वही वास्तविक नवीनता है।”








